कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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उनके नाम थे—दुष्टरोमा, महामाय, छिद्रदंष्ट्र, प्रकम्पन, तनुक्रुद्ध, दुरारोह, सुमाय,
वज्रपंजर, धूमकेतु, प्रमथन, विकटाक्ष आदि। इनके अतिरिक्त सातवें पाताल-पर्यन्त से अनेक
दानव और असुर आये ॥३८-३९॥
किसी के साथ दस हजार, किसी के साथ आठ हजार और किसी के साथ सात हजार
रथ थे और कोई अपने साथ छह लाख, कोई तीन लाख और कोई कम-से-कम दस हजार पैदल
सिपाहियों को लेकर वहाँ आया। इसी के अनुसार एक-एक के साथ हाथी और घोड़े भी
असंख्य थे। मय और सुनीथ की असंख्य सेना भी इसी प्रकार उसमें सम्मिलित
हो गई ॥४०-४२॥
इसके अतिरिक्त सूर्यप्रभ की असंख्य सेना इसी प्रकार ऋतुदत्त आदि की सेनाएं तथा
सुमेरु विद्याधरराज की विद्याधर-सेनाएं भी वहाँ एकत्र हुईं ॥४३॥
तब मयासुर ने ध्यान करते ही उपस्थित सुबाहुकुमार से सूर्यप्रभ आदि के साथ
कहा—॥४४॥
'भगवन्, यह इधर-उधर बिखरी हुई सेना एक साथ नहीं दीख रही है। अतः, यह बताइए
कि फैली हुई सेना को एक साथ कहाँ से देखें ॥४५॥
मुनि ने कहा—'यहाँ से एक योजन (चार कोश) पर कलापग्राम नामक विस्तृत भू-भाग
है। यहाँ जाकर इसका विस्तार देखो' ॥४६॥
सुबाहुकुमार मुनि के ऐसा कहने पर सुमेरु के साथ वे सभी अपनी-अपनी सेनाओं को
लेकर कलाप ग्राम में गये ॥४७॥
वहाँ ऊँचे स्थान पर जाकर असुरों और राजाओं की सेनाओं को वे अलग-अलग देख
सके ॥४८॥
तब सुमेरु ने कहा—'श्रुतधर्मा अब भी हमसे सेना की दृष्टि से अधिक है। उसके अधीन
एक सौ अधिक सौ (एक सौ एक) विद्याधरों के राजा हैं ॥४९॥
उनमें से एक-एक बत्तीस-बत्तीस सरदारों का स्वामी है, किन्तु मैं उनमें से कुछ को
फोड़कर अपनी ओर मिला लूँगा ॥५०॥
इसलिए, प्रातःकाल ही वल्मीक नामक स्थान पर जायेंगे; क्योंकि कल प्रातःकाल फाल्गुन
मास की कृष्णाष्टमी नामक महातिथि है ॥५१॥
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