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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम तरंग २७७

तब मयासुर ने मयप्रभ (सुमीथ) से कहा—'आओ बेटा ! बहुत दिनों के पश्चात्
अपनी माता के दर्शन करो ॥१३३॥
'ठीक है। चलिए' सुगीथ के ऐसा कहने पर आगे-आगे चलता हुआ मयासुर सूर्यप्रभ आदि
के साथ नीचे पाताल में गया ॥१३४॥
उस लोक में भिन्न-भिन्न मणियों और धातु के बने हुए नगरों को देखते हुए वे सम्पूर्ण सोने
के बने हुए नगर में गये ॥१३५॥
यहाँ उन लोगों ने रत्नों के खंभों पर बने हुए और समस्त सम्पत्तियों से भरे हुए गृह में मय
की पत्नी को देखा जिसका नाम लीलावती था। वह अपने सुन्दर रूप से देवांगनाओं को भी नीचा
दिखा रही थी॥१३६-१३७॥
वह सुमीथ को देखते ही घबराकर उठी और सुमीथ भी प्रणाम करके उसके चरणों पर
गिर पड़ा ॥१३८॥
तदनन्तर बहुत दिनों बाद मिले हुए पुत्र का आलिङ्गन करके उसकी माता उसके गुण
सिखाने के कारण अपने पति के बुद्धि-कौशल की प्रशंसा करने लगी। तब मयासुर ने कहा—
'देवि तेरा यह दूसरा पुत्र सुगुम्फीक, तेरे उस पुत्र (सुमीथ) का पुत्र सूर्यप्रभ होकर
बड़ा है ॥१३९-१४०॥
इसे शिवजी ने इसी शरीर से विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है।' तदनन्तर
माता उसे उत्कंठा भरी दृष्टि से देखने लगी। तब वह भी अपने मन्त्रियों के साथ उसके चरणों
पर गिर पड़ा ॥१४१-१४२॥
'केवल सुगुम्फीक के शरीर से क्या करना है बेटा ! तुम इसी शरीर से अच्छे लगते हो' इस
प्रकार आशीर्वाद देकर लीलावती बोली—॥१४३॥
इस पुत्रों की पुनः प्राप्ति के हर्षमय अवसर पर मय ने अपनी कन्या मन्दोदरी और विभीषण
का स्मरण किया। स्मरण करते ही वे दोनों वहाँ उपस्थित हो गये ॥१४४॥
परस्पर के समय का सत्कार-सम्मान प्राप्त करके विभीषण अपने श्वशुर मयासुर से
बोला—'दानवराज ! यदि मेरी बात मानें तो यहाँ दानवों से एकान्तहीन सुखमय और
कल्याणमय जीवन व्यतीत कर रहे हो। तुम्हें देवताओं के साथ निष्कारण वैर न करना चाहिए।
उनके साथ वैर करके हानि के सिवा कुछ लाभ नहीं है। युद्ध में देवताओं ने ही असुरों को
मारा असुरों ने देवताओं को नहीं ॥१४५-१४७॥