Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 276 of 1079

Read in context
Page 276

अष्टम लम्बक २४७
जब ज्ञात हुआ है कि वह सूर्यप्रभ के हाथ लगी है। अतः वह सूर्यप्रभ उस कन्या
(परपुष्टा) के साथ निःशंक होकर हमारे घर आवें। मैं उन्हें विधिपूर्वक सत्कृत करके पत्नी
के साथ उन्हें भेज दूंगा। यदि आपने ऐसा न किया तो आप मेरे शत्रु हैं और मैं आप लोगों का
शत्रु हूँ—॥११९८-११९९॥
अपने स्वामी के इस सन्देश को कहकर दूत चुप हो गया तब चन्द्रप्रभ ने अपने सभी
सम्बन्धी राजाओं से कहा—॥१२० ॥
'इस प्रकार घमण्ड की बातें करनेवाले उसके घर में कैसे जाया जाय।' यह सुनकर राजा
का सिद्धार्थ नामक मन्त्री बोला—'महाराज आपको उसके कहने का बुरा न मानना चाहिए। वह
ऐसा कहने के योग्य है। वह राजा जनमेजय महान् दानी बड़ा विद्वान् और अच्छे ऊँचे पांडव कुल
में उत्पन्न हुआ है। शूर-वीर है और अश्वमेध यज्ञ कर चुका है। वह कभी किसी से पराजित
नहीं हुआ। इस प्रकार, यथार्थता को देखते हुए उसने जो भी सन्देश दिया है वह कुछ भी अनुचित
नहीं है॥१२१-१२३॥
उसने जो शत्रुता की बात कही वह दम्भ के लिए है। अतः उसके घर पर चलना
चाहिए। वह राजा सुप्रतिष्ठ है॥१२४॥
फिर भी उसका अभिप्राय जाँचने के लिए आप किसी दूत को भेजिए'। मन्त्री सिद्धार्थ
के इस प्रकार के वचनों पर सभी ने श्रद्धा प्रकट की ॥१२५॥
तब जिज्ञासा का समाधान करने के लिए चन्द्रप्रभ ने जनमेजय के समीप सिद्धार्थ नामक
दूत को भेजा और जनमेजय के दूत का भी सम्मान किया ॥१२६॥
तदनन्तर प्रहस्त कौशाम्बी के राजा के पास गया और उससे विचार-विमर्श करके तथा
उनका पत्र लाकर राजा चन्द्रप्रभ को प्रसन्न किया ॥१२७॥
राजा चन्द्रप्रभ ने प्रहस्त को शीघ्र अपनी नगरी शाकल में भेजकर परपुष्टा को उसके
साथ जनमेजय के पास भेज दिया ॥१२८॥
तदनन्तर दूसरे दिन सूर्यप्रभ को लेकर चन्द्रप्रभ आदि सम्बन्धी राजा कान्तिसेन के साथ
विमान द्वारा जनमेजय के यहाँ गये ॥१२९॥
वहाँ विप्रभ राजा जनमेजय जामाता के साथ उन सभी सम्बन्धी राजाओं की
अगवानी करके समुचित स्वागत किया और अपनी नगरी में ले गया ॥१३०॥
तथा कन्या का विवाह-संस्कार करके राजा जनमेजय ने पाँच हजार हाथी एक लाख
श्रेष्ठ घोड़े एवं अच्छे-अच्छे रत्न सुवर्ण वस्त्र कपूर आदि से लदे हुए पाँच हजार ऊँट दहेज
में कन्या के साथ दिये ॥१३१-१३२॥