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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक १०७
पाँचवी बार में घोड़े के पैरों से भूमिपर रौंदे गये प्राणहीन अपलोभ के शरीर को
उसके दास युद्धभूमि से उठाकर ले गये ॥१२५॥
तब दर्शकों द्वारा प्रशंसा किये जाते हुए मुखधन का राजा ने भी समुचित सत्कार
सम्मान आदि किया उसे उपहार प्रदान किया एवं अर्थलोभ की पाप से कमाई हुई सारी सम्पत्ति
अधिकृत कर ली ॥१२६ १२७॥
और, उसके स्थान पर दूसरे प्रतिहार की नियुक्ति करके राजा राजभवन को गया।
सज्जन व्यक्ति दुष्टजनों के सम्पर्क से दूर रहकर ही सुखी रहते हैं ॥१२८॥
वह शुभधन भी प्रेम करनेवाली पत्नी मान्यवरा के साथ मुखभोग करता हुआ आनन्द में
विहार करने लगा ॥१२९॥
इस प्रकार, दुर्बल और नीच हृदयवाले कुत्सित पुरुषों से स्त्रियाँ और धन दूर हो जाते हैं
और उदारचेता पुरुषों को इधर-उधर से स्वयं आकर मिलते हैं॥१३० ॥
इसलिए, तुम चिन्ता न करो। आनन्द से नींद लो। महाराज ! तुम राजकुमारी
कर्पूरिका को अवश्य प्राप्त करोगे' ॥१३१॥
नरवाहनदत्त ने राज्यधर से इस प्रकार रहस्य-युक्त वचन सुनकर गोमुख के साथ नींद
ली। प्रातःकाल जब नरवाहनदत्त भोजन करके विश्राम कर ही रहा था कि इतने में बुद्धिमान्
गोमुख ने राज्यधर से कहा- 'तुम मेरे स्वामी के लिए ऐसा यन्त्रमय विमान बनाओ कि वह
कर्पूरसंभव द्वीप में पहुँचकर अपनी प्राणप्यारी को पा सके' ॥१३२-१३४॥
नरवाहनदत्त का कर्पूरसंभव द्वीप के प्रति प्रस्थान
तब उस कुशल शिल्पकार ने पहले से ही तैयार किये हुए वायुयन्त्र-विमान को नर-
वाहनदत्त के लिए तैयार कर दिया ॥१३५॥
मनके समान शीघ्र चलनेवाले उस विमान पर बैठकर वायुवेग के साथ नरवाहनदत्त
अपने धैर्य को देखकर प्रसन्नता से उछलते हुए समुद्र को लाँघकर उत्तर किनारे पर स्थित
कर्पूरसंभव द्वीप में पहुँचा और आकाश से उतरकर कौमुदीश्वर नगर के भीतर भ्रमण करने
लगा ॥१३६ १३८॥
लोगों से पूछने पर उसे द्वीप कर्पूरद्वीप समझकर और गरुड़-रहित होकर वह राजभवन
समीप पहुँचा ॥१३९॥