कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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रात को वहाँ घोड़ों को घास देकर और वृक्ष के नीचे बाँधकर गोमुख के साथ सोने के
लिए बड़े पेड़ पर चढ़ा ॥४२॥
उसकी विशाल शाखा पर सोये हुए उसने डरे हुए घोड़ों की हिनहिनाहट से जागकर नीचे
आये हुए एक सिंह को देखा ॥४३॥
उसे देखकर घोड़ों की रक्षा के लिए नीचे उतरने को उद्यत युवराज को देखकर गोमुख
बोला- शरीर का ध्यान न करके और मुझसे सम्मति भी न करके तुम उतरने की चेष्टा कर
रहे हो। राजा का मूल शरीर है और वही राज्य का मूल मन्त्र है। तुम मनुष्य होकर नख और
दाँतोंवाले पशुओं से युद्ध करने के लिए क्यों तैयार हो रहे हो? इसी शरीर की रक्षा
के लिए हम दोनों इस समय वृक्ष पर चढ़े हुए हैं। गोमुख की इन बातों से युवराज रुक
गया ॥४४-४६॥
घोड़े को मारते हुए शेर पर उसने ऊपर से ही छुरी मारी और वह छुरी सिंह के
शरीर में धँस गई ॥४७॥
छुरी से मारे जाने पर भी सिंह ने उस घोड़े को मारकर दूसरे घोड़े को भी मार
डाला ॥४८॥
तब वत्सेश्वर-पुत्र युवराज ने गोमुख से तलवार लेकर उसे ऊपर से ही फेंककर शेर
के दो टुकड़े कर दिये। और नीचे उतरकर सिंह के शरीर से तलवार खींचकर और फिर वृक्ष
पर चढ़कर उसने वह रात बिताई ॥४९-५०॥
प्रातःकाल वृक्ष से उतरकर नरवाहनदत्त गोमुख के साथ कर्पूरिका की ओर चल
पड़ा ॥५१॥
शेर के द्वारा वाहनों के मारे जाने के कारण पैरों से ही चलते हुए नरवाहनदत्त का मनोरंजन
करने के लिए गोमुख ने मार्ग में कहा-॥५२॥
इन्दीवरसेन और अनिश्चयसेन की कथा
'स्वामी ! मैं इस समय के प्रसंग में तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ। उसे सुनो इस पृथ्वी पर
अपने सौन्दर्य से अलका (कुबेरनगरी) को जीतनेवाली शरावती नाम की एक नगरी है।
उस नगरी में परितोषसेन नाम का राजा था उसकी प्राणों के समान प्यारी दो
रानियाँ थीं ॥५३-५४॥
उनमें से एक अधिकप्रभा नाम की राजा के मन्त्री की कन्या थी और दूसरी
सांध्यालङ्कारा किसी राजवंश की कुमारी थी ॥५५॥