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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक १९१
'हे माता ! मैंने तुमको देखा नहीं। दैवसंयोग से ही गोली तुम्हें लगी। दया करो।
मेरी उद्दण्डता को क्षमा करो' ॥१२॥
यह सुनकर तपस्विनी बोली—'बेटा ! मुझे क्रोध नहीं है। ऐसा कहकर वह नरवाहनदत्त
को आशीर्वाद देकर सान्त्वना देने लगी ॥१३॥
तब नरवाहनदत्त ने उस तपस्विनी को सत्यवादिनी ज्ञानवती और सच्ची तपस्विनी
समझकर नम्रता से पूछा—॥१४॥
'हे भगवती ! तुमने यह कर्पूरिका नाम किसका कहा। यदि मुझ पर प्रसन्न हो
तो उसे बताओ। उसे जानने के लिए मुझे बहुत कौतुक है' ॥१५॥
ऐसा कहते हुए और प्रणाम करते हुए उससे तापसी ने कहा—'समुद्र के पार कर्पूर
संभव¹ नाम का द्वीप है॥१६॥
वहाँ नाम के समान गुणोंवाला कर्पूरक नाम का राजा है। उसकी कर्पूरिका नाम की
सुन्दरी कन्या है ॥ १७॥
वह कन्या इतनी सुन्दरी है कि समुद्र ने अपनी पहली कन्या (लक्ष्मी) के देवताओं द्वारा
अपहरण कर लिये जाने के कारण उसकी इस दूसरी बहन को मानों इस द्वीप में छिपाकर
रखा है ॥१८॥
पुरुषों से द्वेष रखनेवाली वह कन्या विवाह करना नहीं चाहती किन्तु तुम्हारे जाने पर
वह तुम्हारी कामना पूरी करेगी ॥१९॥
इसलिए, बेटा ! तुम वहाँ जाओ तो उस सुन्दरी को प्राप्त करोगे किन्तु जाते हुए तुम्हें
मार्ग में अनेक असह्य कष्ट होंगे ॥२ ० ॥
किन्तु तुम उन कष्टों से घबराना नहीं। उनका परिणाम अच्छा ही होगा। ऐसा
कहकर वह तपस्विनी अदृश्य हो गई ॥२१॥
तदनन्तर नरवाहनदत्त उसकी वाणी से उत्पन्न मदन की आशा से आकृष्ट होकर अपने
साथी गोमुख से बोला—'सखा कर्पूरसम्भव नगर में कर्पूरिका के पास चलें। उसे बिना देखे
मैं एक क्षण भी नहीं रह सकता' ॥२२ २३॥
यह सुनकर गोमुख बोला—'स्वामी ! अधिक साहस न करो। कहाँ समुद्र ! कहाँ वह
नगर ! कहाँ इतना लम्बा रास्ता और कहाँ वह कन्या ! ॥२४॥
एकमात्र नाम सुनकर ही दिव्य स्त्रीजनों को छोड़कर बिना प्रयोजन से सन्देहजनक उस
समुद्र-कन्या के पीछे दौड़ रहे हो ? ॥२५॥
गोमुख से इस प्रकार कहा गया वह वत्सराज का पुत्र बोला—'उस तपस्विनी का कथन
झूठा नहीं हो सकता ॥२६॥
१ अरेबियन नाइट्स सिन्दबाद जहाजी की कहानी में कपूर के टापू का नाम
आया है।—अनु.
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