कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextसप्तम लम्बक [१३७]
उसके इस खेल को देखकर वह ब्राह्मण तपस्या मौन भंग करके बोला—'हे ब्राह्मण !
बिना रुकावट के यह तुम क्या कर रहे हो ? ॥१७॥
आग्रहपूर्वक पूछने पर ब्राह्मण बना हुआ इन्द्र बोला—'जीवों को गंगा पार जाने के लिए
पुल बाँध रहा हूँ'। ॥१८॥
यह सुनकर तपोदत्त बोला—'हे मूर्ख ! लहरों से इधर-उधर बिखरनेवाली बालू से भला
कहीं पुल बँधता है ? ॥१९॥
यह सुनकर ब्राह्मण-रूपी इन्द्र बोला—'यदि तुम यह समझते हो तो तुम बिना पढ़े-सुने
विद्या कैसे प्राप्त करोगे ? ॥२० ॥
व्रत और उपवास आदि से तुम विद्या प्राप्त करने के लिए क्यों उत्सुक हो रहे हो। यह तो
खरगोश के सींग के समान या आकाश में चित्र रचना के समान व्यर्थ बात है॥२१॥
बिना अक्षर जाने लिखना और बिना अध्ययन के विद्या प्राप्ति हो जाय तो कोई भी कभी
अध्ययन न करे'॥२२॥
ब्राह्मण-रूपी इन्द्र से इस प्रकार कहा गया तपोदत्त ब्राह्मण उसकी बात पर विचार कर
और उसे ठीक मानकर तप करना छोड़कर घर चला गया ॥२३॥
इस प्रकार, बुद्धिमान् व्यक्ति को सरलता से ज्ञान कराया जा सकता है, किन्तु मरुभूति
तो दुष्टबुद्धि है। इसे जताया नहीं जा सकता। कुछ बताने या ज्ञान देने पर क्रुद्ध हो
जाता है॥२४॥
गोमुख के ऐसा कहने पर हरिशिख ने बीच में ही कहा—'राजन् ! यह सच है बुद्धिमान्
व्यक्ति को सरलता से ही समझाया जा सकता है' ॥२५॥
इस प्रसंग में कथा सुनें—
विरूपशर्मा ब्राह्मण की कथा
पूर्वकाल में वाराणसी नगरी में विरूपशर्मा नाम का एक दरिद्र ब्राह्मण था॥२६॥
वह अपनी कुरूपता और दरिद्रता से अत्यन्त विरक्त होकर जंगल में जाकर रूप और धन की
प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करने लगा ॥२७॥
तब देवराज इन्द्र बिगड़े और बीमार सियार का रूप धारण करके उसके आश्रम में
आकर उसके समीप पड़े हुए। सड़े-गले और मक्खियों से भरे शरीरवाले उस सियार को
देखकर विरूपशर्मा अपने मन में सोचने लगा ॥२८-२९॥
संसार में अपने पूर्व कर्मों के कारण ऐसे प्राणी भी होते हैं। इस दृष्टि से दैव ने
मुझे बहुत अल्प मात्रा में कुरूप और कुत्सित बनाया है। दैव के लिखे हुए भागों का कौन उल्लंघन
कर सकता है ? ऐसा समझकर विरूपशर्मा तपस्या के स्थान से अपने घर वापस आ
गया ॥३०-३१॥