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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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द्वादश लम्बक १८१
यह जानकर गाँव के पंचों ने मिलकर सम्मति प्रदान की और एकादशमारिका ने उस पथिक
को ग्यारहवाँ पति बना लिया ॥९५॥
जब वह स्त्री कुछ समय तक ही उस पति के साथ रही थी कि उसे शीतज्वर का आक्रमण हो
गया और वह उसका ग्यारहवाँ पति भी मर गया ॥९६॥
तब पत्थरों को भी हँसानेवाली उस एकादशमारिका ने गंगातट पर जाकर संन्यास
ले लिया ॥९७॥
यह कथा सुनकर हँसते हुए नरवाहनदत्त से गोमुख ने फिर कहा—'अब बैल से जीवन
निर्वाह करनेवाले की कथा सुनो॥९८॥
किसी गाँव में एक निर्धन कुटुम्बी पुरुष रहता था। उसके घर में एकमात्र एक बैल ही
उसका धन था ॥९९॥
धनहीन वह सारे कुटुम्ब के और स्वयं भी भोजन बिना उपवास करने पर भी लोभ से उस
बैल को बेचता न था ॥१००॥
अन्त में दुःखी होकर वह विन्ध्यवासिनी देवी के सामने जाकर, कुश के आसन पर बैठ-
कर धन की कामना से निराहार तप करने लगा ॥१०१॥
'उठ तेरे भाग्य में सदा एक बैल ही धन है। इसलिए, उसे बेचकर तू सदा सुख से जीवन
व्यतीत करना' ॥१०२॥
देवी से स्वप्न में इस प्रकार आदेश दिया गया वह प्रातःकाल ही उठकर व्रत का पारण
करके अपने घर चला गया ॥१०३॥
घर आकर भी वह अधीर उस बैल को इसलिए न बेच सका कि इसे बेच देने पर
सर्वथा निर्धन होकर मैं कैसे जी सकूँगा ॥१०४॥
तदनन्तर, बातचीत के प्रसंग में स्वप्न में दिये हुए देवी के आदेश को अपने बुद्धिमान्
मित्र से कहा। तब उपवास से दुर्बल उससे उसके मित्र ने कहा—॥१०५॥
'अरे मूर्ख तेरे भाग्य में एक ही बैल है। उसे बेचकर तू सदा जीवित रहेगा। देवी के
इस आदेश को तूने नहीं समझा' ॥१०६॥
'तू इस बैल को बेचकर अपने कुटुम्ब का पालन कर। तब दूसरा बैल होगा। उसे बेचने
पर तीसरा' ॥१०७॥
उस मित्र से इस प्रकार कहे गये उस गँवार ने वैसा ही किया। तदनन्तर, एक-एक बैल
को बेच-बेचकर वह सुखपूर्वक रहने लगा ॥१०८॥
इस प्रकार, व्यक्तित्व के अनुसार दैव सबको फल देता है। इसलिए, मनुष्य में उत्तम
व्यक्तित्व होना चाहिए। सत्त्वहीन पुरुष को लक्ष्मी वरण नहीं करती ॥१०९॥