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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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द्वयष्टम लम्बक १९७
इस प्रकार आदेश देकर देवी पार्वती अन्तर्धान हो गई और प्रातःकाल उठकर हिरण्याक्ष ने
स्नान सन्ध्या आदि संयम-कार्य किये ॥२३४॥
तब अमरेश्वर के सम्मुख जाकर और प्रणाम करके वह बैठ गया जहाँ पर कि उस
तपस्विनी ने मिलने का संकेत दिया था॥२३५॥
इसी बीच अपने घर में किसी प्रकार सोई हुई मृगांकप्रभा को भी नींद आई और गौरी ने
स्वप्न में उसे भी यह आदेश दिया ॥२३६॥
शापमुक्त और लावण्यी के हस्त-स्पर्श से पुनः विद्याधर-योनि को प्राप्त हिरण्याक्ष को तू
पति के रूप में प्राप्त करेगी। शोक मत कर ॥२३७॥
ऐसा कहकर देवी के अन्तर्धान हो जाने पर वह प्रातः काल उठी और उस तपस्विनी को
मृगांकप्रभा ने रात का स्वप्न सुनाया ॥२३८॥
यह सुनकर वह तपस्विनी मर्त्यलोक में आकर अमरनाथ शिव के मन्दिर में उसकी
प्रतीक्षा में बैठे हुए हिरण्याक्ष से बोली--॥२३९॥
'बेटा आओ। विद्याधर-लोक में चलें। ऐसा कहकर व प्रणाम करते हुए हिरण्याक्ष
को अपने हाथ से अपनी बाहु पर बिठाकर तपस्विनी आकाश में उड़ गई ॥२४०॥
इतने में ही वह हिरण्याक्ष विद्याधर राजा होकर शाप क्षय होने से अपनी पिछली
जाति को स्मरण करके उस तपस्विनी से बोला ॥२४१॥
'हिमालय के धवलकूट नाम के नगर का अमृततेज नामक राजा मुझे तुम जानो ॥२४२॥
मैं सूर्यप्रभ से अपमान जन्य शाप के कारण मुनि से शाप प्राप्त करके मर्त्यलोक में उत्पन्न
हुआ था। तेरे हाथ के स्पर्श तक ही मेरा शाप था ॥२४३॥
मुनि से शापित मुझे देखकर मेरी पत्नी ने दुःख से अपना शरीर छोड़ दिया। वही मेरी
पूर्वकी पत्नी इस समय मृगांकप्रभा के रूप में है ॥२४४॥
अब मैं तेरे साथ जाकर उसे प्राप्त करूँगा। तेरे पवित्र हाथ के स्पर्श से मेरा यह शाप
समाप्त होगया ॥२४५॥
ऐसा कहता हुआ वह विद्याधरेन्द्र अमृततेज आकाश मार्ग से हिमालय पर गया और वहाँ
उसने उद्यान में बैठी हुई मृगांकप्रभा को देखा और मृगांकप्रभा ने भी उसे जैसा तपस्विनी
ने बताया था उसी रूप में देखा ॥२४६-२४७॥
आश्चर्य की बात है कि चाहने वालों के मार्ग से देखा परस्पर दोनों के हृदय में घुसकर
फिर बिना निकले ही वे दोनों आँखों के मार्ग से भी उसी प्रकार फिर दोनों एक दूसरे के हृदय
में घुस गये ॥२४८॥