कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ७८७
उस यक्ष ने जाकर अपनी युक्ति से उन निधानवादी असफल मनोरथ ब्राह्मणों को
मार डाला ॥७४॥
यह सब जानकर, कुबेर विरूपाक्ष पर क्रोध करके बोले—'अरे पापी तूने सहसा यह
ब्रह्महत्या क्यों करा दी। खजाना खोजनेवाले दरिद्र क्या नहीं करते? उन्हें विघ्न करके और
भय आदि दिखाकर दूर किया जाता है, जान से नहीं मारा जाता' ॥७५-७६॥
ऐसा कहकर कुबेर ने उस यक्ष को शाप दिया कि तू इस पाप को करने से मनुष्य-योनि
में उत्पन्न होगा ॥७७॥
तदनन्तर वह शापित विरूपाक्ष मनुष्य-योनि में किसी ब्राह्मण के यहाँ उत्पन्न हुआ।
तब उस यक्ष विरूपाक्ष की पतिव्रता पत्नी ने कुबेर से प्रार्थना की—'हे स्वामी ! मुझे भी वहीं
फेंक दो जहाँ तुमने मेरे पति को फेंका है। मैं उससे वियुक्त होकर जीवित नहीं रह सकती'।
उस पतिव्रता की प्रार्थना पर कुबेर ने कहा—॥७८-८०॥
'तेरा पति जिस ब्राह्मण के घर में उत्पन्न हुआ है, तू उसी ब्राह्मण की दासी के घर में
गिरेगी और योनि से उत्पन्न नहीं होगी। वहाँ पर पति के साथ तेरा समागम होगा और तेरी
कृपा से वह शाप से मुक्त होकर पुनः मेरे पास आ जायगा' ॥८१-८२॥
इस प्रकार कुबेर के आदेश से वह सती पद्मिनी मानुषी कन्या बनकर उसी ब्राह्मण की
दासी के द्वार पर जा गिरी ॥८३॥
दासी ने उस अद्भुत कन्या को अकस्मात् देखा और उसे अपने स्वामी उस ब्राह्मण के
पास ले गई ॥८४॥
'यह कन्या कोई दिव्या स्त्री है और इसीलिए अवश्य अयोनिजा है। मेरी धारणा ऐसा
कहती है। तू इसे बिना किसी शंका के ले आ ॥८५॥
यह मेरे पुत्र की पत्नी होने योग्य है। ब्राह्मण अपनी दासी को ऐसा कहकर प्रसन्न
हुआ ॥८६॥
क्रमशः वह कन्या और ब्राह्मणकुमार दोनों बड़े हो गये और परस्पर देखने से ही घनिष्ठ
प्रेमी बन गये ॥८७॥
तदनन्तर ब्राह्मण ने उन दोनों का विवाह करके उन्हें दम्पती बना दिया। वे दोनों पूर्व
जन्म का स्मरण न करते हुए भी ऐसा अनुभव करते थे माना वे परस्पर चिरकालीन वियोग के
पश्चात् मिले हों ॥८८॥