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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक ६४९

यह सुनकर आगे जाने पर उसने आम का वृक्ष देखा और उसके फल खाने की इच्छा
प्रकट की। वैश्यपुत्र ने पहले के ही समान उसे रोका। उससे मन-ही-मन खिन्न हुआ राजकुमार
धीरे-धीरे रङ्गपुर-गृह में पहुँचा। वहाँ पर विवाह के लिए निर्मित गृह में प्रवेश करते हुए राजकुमार
को वैश्यपुत्र ने रोक दिया। उसके रोकते ही वह मकान गिर गया॥१३८-१४०॥

वहाँ से किसी प्रकार बचकर निकला और कुछ विश्वस्त हुआ राजपुत्र रात को पत्नी
के साथ दूसरे घर में गया। वहाँ भी वह वैश्यपुत्र छिपकर जा बैठा। राजकुमार पलँग पर बैठते ही
छींकने लगा और सौ बार पलँग के नीचे छिपा हुआ वैश्यपुत्र सौ बार 'जीओ जीओ'
कहता रहा! इस प्रकार अपना कार्य समाप्त कर के प्रसन्न वह वैश्यपुत्र धीरे से बाहर
निकला॥१४१-१४३॥

बाहर जाते हुए उसे वधू के साथ राजपुत्र ने देख लिया। फलतः ईर्ष्या से स्नेह को भुला
कर कोपावेश में उसने द्वारपालों से कहा ॥१४४॥

'यह पापी एकान्त में मेरे शयनागार में घुस आया। इसलिए इसे रात भर बाँधकर रखो।
प्रातःकाल इसे फाँसी दी जायगी' ॥१४५॥

यह सुनकर पहरेदारों द्वारा बाँधे हुए उस वैश्यपुत्र ने रात व्यतीत की। प्रातःकाल
फाँसी पर ले जाये जाते हुए उसने सिपाहियों से कहा ॥१४६॥

'पहले मुझे उस राजपुत्र के समीप ले चलो मैं उसे कुछ कारण बताऊंगा तब मेरा वध
करना' ॥१४७॥

उनसे इस प्रकार कहे गये सिपाहियों मन्त्रियों एवं अन्य लोगों द्वारा समझाये जाने पर
राजपुत्र ने उसे लाने की आज्ञा दी ॥१४८॥

वहाँ लाये गये बनिये के पुत्र ने राजकुमार से सारा वृत्तान्त कह सुनाया। विवाहवाले
घर के गिर जाने की घटना से विश्वास करके राजपुत्र ने उसकी बात सच मान ली॥१४९॥

तब वध से मुक्त उस वैश्यपुत्र के साथ राजपुत्र अपनी पत्नी-सहित प्रसन्न चित्त से अपनी
नगरी को लौट आया। वहाँ आकर वैश्यपुत्र भी विवाह करके सभी जनों से प्रशंसा किया जाता
हुआ सुखपूर्वक रहने लगा ॥१५०-१५१॥

इसी प्रकार राजपुत्र मदोन्मत्त हाथी के समान अपने नियन्ता (महावत) की बातें न मान
पर उसे भी मार डालते हैं और अपना हित नहीं समझते ॥१५२॥
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