कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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कन्यादान से परलोक में जो सुख मिलता है वह पुत्रों से कहाँ मिल सकता है ?
राजा सुषेण और सुलोचना की कथा
मैं इस सम्बन्ध में सुलोचना की कथा कहता हूँ सुनो ॥५० ॥
चित्रकूट^१ पर्वत पर सुषेण नाम का एक युवा राजा था। उसे ब्रह्मा ने मानों शिवजी
की ईर्ष्या से नवीन कामदेव के समान निर्मित किया था। उस राजा ने उस विशाल पर्वत की
तलहटी में एक सुन्दर उद्यान बनवाया जो देवताओं के नन्दन वन के विहार में विरसता उत्पन्न
करता था। अर्थात् उसने अपनी सुन्दरता से नन्दन वन को भी तिरस्कृत कर दिया था ॥५१-५२॥
उस उद्यान के मध्य उस राजा ने विकसित कमलों वाली एक सुन्दर बावली बनवाई
थी जो मानों लक्ष्मी के लीला कमलों के लिए नये खजाने के समान थी ॥५३॥
अच्छ रत्नों से जड़ी हुई सीढ़ियोंवाली उस बावली के किनारे पत्नियों के अभाव में
वह अकेला ही बैठा रहता था। एक बार उसी के आकाशमार्ग से जाती हुई रम्भा इन्द्र-भवन
से अकस्मात् वहीं आ गई ॥५४-५५॥
रम्भा ने उद्यान में बैठे हुए राजा को इस प्रकार देखा मानों प्रफुल्ल पुष्प-वन में मूर्ति
मान् वसन्त विराजमान हो ॥५६॥
उसे देखकर रम्भा सोचने लगी बावली के कमलों पर गिरी हुई क्या यह स्वयं की लक्ष्मी
है ?^२ अथवा साक्षात् चन्द्रमा है ? क्या यह इसकी स्थायी शोभा है अथवा पुष्पधन्वा कामदेव
स्वयं ही पुष्प-चयन करने यहाँ उपस्थित हुआ है। किन्तु यदि वह है तो उसकी सहचारिणी
रति यहाँ कहाँ है। उत्सुकता के कारण इस प्रकार तर्क-वितर्क करती हुई रम्भा मनुष्य के
रूप में राजा के समीप आई ॥५७-५९॥
समीप आई हुई उसे देखकर राजा सोचने लगा कि यह असम्भव शरीरवाली कौन
स्त्री है ? यह मानुषी तो नहीं है क्योंकि इसके चरण भूमिस्यर्श नहीं करते और आँखें भी अपलक
हैं। अतः यह अवश्य ही कोई दिव्या स्त्री है ॥६०-६१॥
पूछने पर कदाचित् यह भाग न जाय इसलिए इससे पूछना नहीं चाहिए। कारण में
शंकित दिव्य स्त्रियाँ प्राय रति का भेद (रहस्य खुलना) सहन नहीं करतीं ॥६२॥
ऐसा सोचते हुए उस राजा ने उससे बात करते हुए समझ उसी समय उस सूखे से
सङ्ग किया ॥६३॥
१ किसी-किसी पुस्तक में त्रिकूटाचल पर्वत का नाम आया है। यह हिमालय का एक
भाग है, जिसके शिखर, सोने चान्दी और लोहे के बने हुए हैं। श्रीमद्भागवत के आठव स्कन्ध
में इसका कथन है।
२ इस वाक्य में उत्प्रेक्षालंकार है।