Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

Page 574 of 876

Read in context
Page 574

पंचम लम्बक ५२७
गोविन्दस्वामी ने मार्ग में चलते हुए जटाधारी भस्म रमाये खप्पर लिये और अर्धचन्द्र
धारण किय हुए शिव के समान एक तपस्वी को देखा ॥८१॥
उसने उस तपस्वी से अपना शुभ-अशुभ पूछा। तब वह योगी कहने लगा—'तुम्हारे तीनों
बालकों का भविष्य कल्याणमय है किन्तु इनमें छोटे बालक विजयदत्त से तुम्हारा वियोग
हो जायगा। तब बड़े पुत्र अशोकदत्त के प्रभाव से उसके साथ फिर तुम्हारा समागम
होगा' ॥८२-८४॥
इस प्रकार उस ज्ञानी से कहा हुआ गोविन्दस्वामी सुख और दुःख दोनों से आक्रान्त
होकर वहाँ से चला गया ॥८५॥
तदनन्तर वाराणसी पहुँचकर उसके बाहरी भाग में स्थित चंडिका के मन्दिर में ठहरा।
यहाँ देवी की पूजा आदि कार्यों में उसका दिन बीत गया। रात में भी वह मन्दिर के बाहर, वृक्ष
के नीचे अन्य देशों से आये हुए यात्रियों के साथ सपरिवार सो गया ॥८६-८७॥
यात्रा से होनेवाली थकावट के कारण अन्य सभी यात्रियों के पत्त आदि के बिछावनों पर
सो जाने के पश्चात् जागते हुए उस ब्राह्मण के छोटे पुत्र को शीतज्वर का महान् प्रकोप हुआ।
भविष्य में होनेवाले अपने परिवार के वियोग के कारण-स्वरूप उसके ज्वर का प्रकोप बढ़ गया।
रौंगटे खड़े हो गये और शरीर कांपने लगा ॥८८-९०॥
ठंडक से काँपते हुए उसने पिता को जगाकर कहा—'पिता ! मुझे भीषण शीतज्वर
कष्ट दे रहा है। इसलिए इस शीत को दूर करने के लिए लकड़ी लाकर आग जलाओ। इसके
बिना न तो मुझे शान्ति मिलेगी और न रात ही बिता सकूँगा' ॥९१-९२॥
यह सुनकर उसके कष्ट से घबराया हुआ गोविन्दस्वामी बोला—'इस समय रात को
आग कहाँ से लगाऊँ? तब विजयदत्त ने कहा—'पिताजी वह देखो पास ही कहीं आग जल रही
है। इसलिए काँपते हुए मुझे हाथ पकड़कर वहाँ ले चलो' ॥९३-९५॥