कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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स्वतन्त्रता से उछलती हुई मरुभूमि की किरणों से वह वन मानों सूर्य के उग्र तेज को
जीतना चाहता था॥९॥
जल के सम्पर्क से रहित निरन्तर चलते रहने पर भी समाप्त न होनेवाले एवं पग-पग पर
विपत्तियों से भरे रम्य रास्तोंवाले उस वन को कुछ दिनों में लांघकर उसने एकान्त और शान्त
स्थान में शीतल और स्वच्छ जल से भरे हुए एक बड़े सरोवर को देखा॥१०-११॥
उस सरोवर में खिले हुए कमल ऊपर उठे हुए छत्र के समान लग रहे थे और हंस-रूपी
चँवर इधर-उधर चलायमान हो रहे थे। मानों वह सरोवर, सभी सरोवरों के राजा की शोभा
धारण कर रहा था॥१२॥
शक्तिदेव ने उसमें स्नान आदि किया और तत्पश्चात् उसने उस सरोवर के उत्तर की ओर
सफल एवं सघन वृक्षों से भरे हुए आश्रम-स्थल को देखा। उसमें एक पीपल-वृक्ष के नीचे अनेक
तपस्वियों से घिरे हुए सूर्यतपा नामक ऋषि को देखा। वह ऋषि अपनी अवस्था के सौ वर्षों के
समान मानों सौ गाँठों से गूँथी हुई एवं वृद्धावस्था से श्वेत कनपटी में लटकती हुई स्फटिक की माला
से शोभित हो रहा था॥१३-१५॥
वह शक्तिदेव प्रणाम करके उस मुनि के समीप गया और मुनि ने भी अतिथि-सत्कार
करते हुए उसका स्वागत किया॥१६॥
मुनि ने भोजन के लिए फल आदि देकर उससे पूछा—'हे भद्र कहाँ से आये हो और कहाँ
जाओगे बताओ'॥१७॥
'भगवन् ! मैं वर्धमान नगर से आया हूँ और प्रतिज्ञा करके कनकपुरी जाने के लिए
उद्यत हूँ ॥१८॥
पता नहीं वह नगरी कहाँ है यदि आप जानते हों तो कृपाकर कहें। इस प्रकार नम्रता
पूर्वक शक्तिदेव ने मुनि से कहा॥१९॥
'बेटा मुझे इस आश्रम स्थान में एक सौ आठ वर्ष व्यतीत हो गये। आज तक मैंने कनक
पुरी का नाम भी नहीं सुना। इस प्रकार मुनि से कहा गया शक्तिदेव अत्यन्त निराश और
दुःखी हुआ॥२० ॥
तब फिर वह बोला-'यदि ऐसा है तो मैं इस पृथ्वी पर घूमते-घूमते मर जाऊंगा। क्रमशः
उसकी सारी बातें सुनकर मुनि उससे बोला—'यदि तुम्हारा यह निश्चय है, तो मैं तुमसे कहता हूँ
सुनो।' यहाँ से तीन सौ योजन (अर्थात् बारह सौ कोस) पर काम्पिल्य नाम का नगर है। वहाँ
पर उत्तर नाम का पर्वत है उनमें एक आश्रम है॥२१ २३॥