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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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विशेषकर उच्च व्यक्तियों को तो अधिकतर झूठे ही कलंकित कर देते हैं। इस प्रसंग में
मैं तुम्हें हरस्वामी की एक कथा सुनाता हूँ, सुनो' ॥२ ५॥

हरस्वामी की कथा

गंगा के तट पर कुसुमपुर¹ नाम का जो नगर है, उसमें हरस्वामी नाम का एक तपस्वी
तीर्थ-यात्री रहता था॥२ ६॥
वह भिक्षावृत्ति से जीवन-निर्वाह करता हुआ वहीं पर्णकुटी बनाकर रहता था। वह
अपनी कठोर तपस्या के प्रभाव से जनता के सम्मान एवं श्रद्धा का भाजन बन गया॥२ ७॥
एकबार भिक्षा के लिए निकले हुए उस शूर से जलकर उससे ईर्ष्या करनेवाले एक दुष्ट ने
लोगों के सम्मुख कहा—॥२ ८॥
'क्या आप लोग जानते हैं कि यह कैसा कपटी तपस्वी है। इसी ने इस नगर के सभी बच्चों
को खा डाला' ॥२ ९॥
यह सुनकर उसी के समान एक दूसरा मनुष्य बोला—'सच है, मैंने भी लोगों को ऐसा
कहते हुए सुना है' ॥२१०॥
'यह ठीक है' इन शब्दों से एक तीसरे ने भी उसका समर्थन किया। कारण यह है कि
दुष्टों की चर्चा सज्जन व्यक्तियों की निन्दा की लड़ी बाँध देती है॥२११॥
इसी क्रम से यह चर्चा (अफवाह) सारे नगर में फैल गई। फलतः उसने व्यापक
रूप धारण कर लिया॥२१२॥
नगरनिवासी अब अपने बच्चों को घरों से निकलने नहीं देते थे कि 'हरस्वामी बच्चों
को ले जाकर खा जाता है॥२१३॥
तब नगर के ब्राह्मणों ने बच्चों के भय से डरकर एक गोष्ठी करके निश्चय किया कि
जिससे हरस्वामी को नगर से निकाल दिया जाय॥२१४॥
यह निश्चय करके भी भयभीत ब्राह्मण उससे स्पष्ट रूप से यह कहने में डरते थे कि कहीं
वह हम लोगों को ही न खा जाय। इसलिए दूतों के द्वारा वे ब्राह्मण उसके पास सन्देश भेजने
लगे। वे दूत दूर से ही उस हरस्वामी से कहने लगे कि 'तुम इस नगर से बाहर चले जाओ।
ऐसा तुम्हें ब्राह्मणों ने कहलाया है' ॥२१५-२१६॥
आश्चर्यचकित हरस्वामी के यह पूछने पर कि 'किस कारण मुझे निकाला जा रहा है'
दूतों ने उत्तर दिया कि 'तुम यहाँ छोटे बच्चों को खा जाते हो' ॥२१७॥
यह सुनकर वह स्वयं विश्वास दिलाने के लिए ब्राह्मणों के पास गया, जब कि उसके भय
से वे लोग दूर भाग रहे थे॥२१८॥


१. कुसुमपुर = फूलों का नगर, आधुनिक पटना नगर।
२. गोष्ठी = सभा, समिति (Meeting)।