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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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गुणाढ्य के विस्तृत भौगोलिक क्षितिज में पूर्व के महोदधि और पश्चिम के रत्नाकर समुद्रों के
इस पार और उस पार के भूखंडों की अनेक कथाएं सम्मिलित थीं इसकी सूचना बृहत्कथा की कई
उत्तरकालीन वाचनाओं से प्राप्त होती है। बृहत्कथा के रूप में गुणाढ्य ने जो साहित्यिक सत्र
विक्रमीय प्रथम शती के लगभग आरम्भ किया था वह वाङ्मय का सहस्र सम्वत्सर सत्र बन गया
और संस्कृत-प्राकृत के कई प्रतिभाशाली रचयिताओं ने उसमें भाग लिया। सोमदेव का कथासरित्-
सागर बृहत्कथा के विकास की अन्तिम कड़ी है। वह बृहत्कथा की काश्मीरी वाचना है, जिसमें
सोमदेव की प्रतिभाशालीनी लेखनी ने यथेष्ट परिवर्तन किए हैं।
कथासरित्सागर के स्वरूप के यथार्थ परिचय के लिये बृहत्कथा और उसकी वाचनाओं
के विषय में जानना आवश्यक है। उद्योतन सूरि द्वारा विरचित (७७९ ई.) कुवलयमालाकहा
प्राकृत-भाषा का अति उत्कृष्ट कथा-ग्रन्थ अभी प्रकाश में आया है। उसके आरम्भ में बृहत्कथा
को 'वड्डकहा' कहते हुए लिखा है—
पयलक्कतायमणिलया सिक्खाविउकइपयस्त सुहयं वा।
ककलासब्भो गुणड्डो सरसई जस्स वड्ढकहा ॥
(कुवलयमाला पृ० ३ पंक्ति २१)
'बृहत्कथा क्या है साक्षात् सरस्वती है। गुणाढ्य स्वयं ब्रह्मा हैं। यह बृहत्कथा सब कलाओं
की खान है। कविजन इसे पढ़कर शिक्षित बनते हैं। उस समय बृहत्कथा की प्रशंसा में इससे
अधिक और क्या कहा जा सकता था ? उद्योतन सूरि से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व बाण ने लिखा था—
समुद्दीपितकन्दर्पा कृतगौरीप्रसाधना।
हरलीलेव लोकस्य विस्मयाय बृहत्कथा॥
बाण के उल्लेख से यह ज्ञात होता है कि उसके समय तक बृहत्कथा कामकथा के रूप में
ही सुरक्षित थी। यही उसका मूल रूप था। 'कृतगौरीप्रसाधना' से सूचित होता है कि बृहत्कथा
का आरम्भिक पाठ शिव-पार्वती के संवाद के रूप में था अर्थात् पार्वती ने शिवजी से कथा सुनाने
की प्रार्थना की और उत्तर में शिवजी ने जो कथा सुनाई, वही बृहत्कथा हुई। सोमदेव ने कथासरित्
सागर की पहली तरंग में इस भूमिका का उल्लेख किया है। तिलकमंजरी के कर्त्ता धनपाल ने
(११वीं शती) बृहत्कथा की उपमा उस समुद्र से दी है जिसकी एक-एक बूँद से अन्य कितनी ही
कथाओं की रचना हुई—
सत्यं बृहत्कथाम्भोधेर्बिन्दुमादाय संस्कृताः।
तेनेतरकथाकन्थाः प्रतिभान्ति तदग्रतः॥
आचार्य हेमचन्द्र ने काव्यानुशासन की स्वोपज्ञवृत्ति में कथाओं के भेद बताते हुए बृहत्कथा
का उल्लेख किया है (दम्भाङ्किताऽमृतान्निर्गताऽहम्नराचरितवद् बृहत्कथा च ८ सू ८)।