कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
Page 480 of 876
Read in contextचतुर्थ लम्बक ४३७
मुझ वृद्ध की अब कौन-सी चाह शेष रह गई है। जबकि युवक होकर तुम राज्य को तृण
के समान त्याग रहे हो' ॥४४॥
पत्नी के साथ राजा के इस प्रकार कहने पर जीमूतवाहन पिता के साथ मलयपर्वत को चला
गया ॥४५॥
चन्दन वृक्षों से आवृत झरनोंवाले और सिद्ध-महात्माओं के निवासस्थान मलयपर्वत में
वह आश्रम बनाकर पिता की सेवा में तत्पर हो गया ॥४६॥
वहाँ पर सिद्धों के राजा विश्वावसु का पुत्र मित्रावसु जीमूतवाहन का मित्र बन गया। ज्ञानी
जीमूतवाहन ने अपने मित्र विश्वावसु की बहिन को किसी समय एकान्त में देखा जो पूर्वजन्म में
उसकी प्यारी पत्नी थी ॥४७-४८॥
उस समय उन दोनों युवकों का परस्पर दर्शन मन-रूपी मृग का दृढ़ बन्धन करने में
रस्सी के समान हुआ—अर्थात् दोनों ही दोनों के प्रति प्रेम-बंधन में बँध गये ॥४९॥
कुछ समय के अनन्तर तीनों लोक के पूज्य जीमूतवाहन के समीप आकर मित्रावसु
प्रसन्नतापूर्वक बोला—॥५०॥
'मित्र! मलयवती नाम की मेरी छोटी बहिन है। उसे मैं तुम्हें देता हूँ। तुम मना न
करना ॥५१॥
यह सुनते ही जीमूतवाहन भी बोला कि 'युवराज! पूर्वजन्म में भी वह मेरी पत्नी थी
और उसी जन्म में तुम मेरे दूसरे हृदय के समान मित्र थे ॥५२॥
मैं पूर्वजन्म का ज्ञानी हूँ। इसलिए अपने तुम्हारे और उसके पूर्वजन्म का वृत्तान्त स्मरण
करता हूँ ॥५३॥
इस प्रकार कहते हुए जीमूतवाहन का मित्रावसु ने कहा कि 'पूर्वजन्म की कथा सुनाओ!
उसे सुनने की मेरी बहुत इच्छा है' ॥५४॥
जीमूतवाहन के पूर्वजन्म की कथा
मित्रावसु से यह सुनकर जीमूतवाहन ने पूर्वजन्म की कथा उसके लिए कहनी
प्रारम्भ की ॥५५॥
मैं पूर्वजन्म में आकाश में विचरण करनेवाला विद्याधर था। किसी समय उड़ते-उड़ते
मैं हिमालय के शिखर का उल्लंघन कर गया। उस शिखर के नीचे शिवजी पार्वती के साथ विहार
कर रहे थे ॥५६॥
इस प्रकार शिखर लंघन से क्रुद्ध शिवजी ने मुझे शाप दिया कि मर्त्ययोनि में तेरा पतन
हो' ॥५७॥