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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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चतुर्थ लम्बक ४३५
इसलिए हमारे यहाँ यह जो वांछित फलदेने वाला कल्पवृक्ष है, उसे यदि परोपकार के
लिए प्रयुक्त किया जाय तो उसकी सफलता हो ॥२९॥
इसलिए मैं चाहता हूँ कि इस वृक्ष की सम्पत्ति से संसार के समस्त याचक
धनी हो जायं ॥३०॥
पिता को इस प्रकार निवेदन करके और उनकी आज्ञा प्राप्त करके जीमूतवाहन ने कल्पद्रुम
के पास आकर कहा —॥३१॥
'हे देव ! तुम सर्वथा हमारे अभीष्ट फलों को देते रहे। आज तुम मेरी एक अभिलाषा
पूर्ण करो ॥३२॥
हे देव ! तुम इस सारी पृथ्वी को दरिद्रता से रहित कर दो। तुम्हारा कल्याण हो।
मैंने तुम्हें धन चाहनेवाले याचकों के लिए दे दिया ॥३३॥
धैर्यशाली जीमूतवाहन द्वारा इस प्रकार प्रार्थित उस कल्पवृक्ष ने भूमि पर प्रचुर स्वर्ण
की वर्षा की और सारी प्रजा प्रसन्न हो गई ॥३४॥
दयालु और बोधिसत्त्व के अंश जीमूतवाहन को छोड़कर और कौन ऐसा उदार है, जो
कल्पद्रुम को भी याचकों के लिए दे डाले ॥३५॥
इस प्रकार जीमूतवाहन के प्रति दिग्दिगन्त अनुरागपूर्ण हो गये और जीमूतवाहन का
उज्ज्वल तथा महान् यश चारों ओर फैल गया ॥३६॥
तब जीमूतकेतु के राज्य को पुत्र-परम्परा से चलनेवाला देखकर, उनके कुटुम्बियों को
ईर्ष्या उत्पन्न हुई और वे राजा के विरुद्ध हो गये ॥३७॥
दान के लिए उत्सर्ग किये गये कल्पवृक्ष के निःसार हो जाने पर, अतएव राजा का प्रभाव
हीन समझकर उन्होंने उनपर विजय प्राप्त करना आसान समझा ॥३८॥
तदनन्तर उनके इकट्ठे होकर युद्ध के लिए तैयार हो जाने पर धैर्यशाली जीमूतवाहन ने
पिता से कहा— जैसे यह शरीर जल के बुलबुला के समान है, उसी प्रकार जीभों के लोलत्व के
समान यह राज्यलक्ष्मी किसके उपभोग में आ सकती है। ऐसी अस्थिर लक्ष्मी के लिए कौन
बुद्धिमान् आपस में संघर्ष करना चाहता है। इसलिए पिता ! मैं आज कुटुम्बियों के साथ युद्ध
करना नहीं चाहता। सोचता हूँ कि इस राज्य को छोड़कर कहीं वन में चला जाना चाहिए।
वे हमारे राज्य भोगें और अपने कुल का भी क्षय न हो ॥३९-४०॥
ऐसा कहते हुए जीमूतवाहन को पिता जीमूतकेतु ने निश्चय करके कहा—'बेटा! मैं
भी उसी वन में जाना चाहता हूँ ॥४१-४२॥