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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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तृतीय लम्बक ३३७
'माता ! एक रात मैं यहाँ निवास करना चाहता हूँ'—ऐसा कहकर वह किसी बूढ़ी
के मकान में घुसा ॥२५५॥
आश्रय देना स्वीकार करके तुरन्त ही उसका स्वागत करके दुःख-हृदया ब्राह्मणी उसके
समीप आकर बोली—बेटा ! यह सारा घर मैंने तुम्हें ही दे दिया तुम इसे ले लो क्योंकि मेरा
जीवन अब समाप्त हो रहा है' ॥२५६-२५७॥
'तुम ऐसा क्यों कर रही हो?'—विदूषक से इस प्रकार पूछी गई वृद्धा फिर बोली—'सुनो
मैं तुम्हें सब सुनाती हूँ' ॥२५८॥
बेटा इस नगर में देवसेन नामक राजा है। उसके एक परम सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई,
जो भू-तल का भूषण थी ॥२५९॥
राजा ने 'मैंने इसे बड़े ही दुःख से पाया है'—ऐसा सोच अत्यन्त वात्सल्य-स्नेह-युक्त
होकर उसका नाम 'दुःखलब्धिका' रखा ॥२६०॥
कुछ समय व्यतीत होने पर, यौवन को प्राप्त उस कन्या को अपने घर पर आये हुए
कच्छप-देश के राजा के लिए दे दिया ॥२६१॥
वह कच्छपराज उसके साथ वास-घर में प्रवेश करते ही तत्क्षण मर गया ॥२६२॥
इस घटना से दुःखी होकर देवसेन ने वह कन्या दूसरे राजा को दी किन्तु वह भी इसी प्रकार
मर गया ॥२६३॥
जब इस भय के कारण अन्य किसी राजा ने उस कन्या का वरण स्वीकार नहीं किया तब
राजा ने अपने सेनापति को आज्ञा दी कि तुम इसी नगर से प्रतिदिन एक-एक ब्राह्मण या क्षत्रिय
पुरुष को लाकर इस कन्या के शयनागार में भेजो। देखते हैं कि कबतक कितने मरते हैं। जो
इसमें सफल हो जायगा नहीं मरेगा वही इसका पति होगा। आश्चर्यकारी दैव की गति-विधि
जानी नहीं जा सकती ॥२६४-२६७॥
इस प्रकार राजा की आज्ञा से सेनापति प्रतिदिन पारी के क्रम से एक-एक सुन्दर पुरुष
को लाता रहा ॥२६८॥
इस प्रकार क्रमशः एक सौ व्यक्ति मारे गये मुझ अभागिन का भी एक ही
पुत्र है ॥२६९॥
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