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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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तृतीय लम्बक ३२७
यह सुनकर वह प्रसन्न हुआ। सच है ऐसे वीर और सत्कार्यकर्ताओं को देवताओं की
भी कृपा प्राप्त होती है॥१७८ ॥
तब विदूषक ने उस मृत साधु के आँचल से सरसों निकालकर एक हाथ में लिये और दूसरे
हाथ से राजकन्या को गोद में लेकर बाहर निकला ॥१७९॥
जब वह देवी के मन्दिर से बाहर निकला तब उसे पुनः दूसरी आकाशवाणी
सुन पड़ी—'हे महाबीर ! महीने के अन्त में तुम इस मन्दिर में फिर आना यह भूलना
नहीं ॥१८०-१८१॥
यह सुनकर और उसे स्वीकार करके देवी की कृपा से राजकुमारी को लिये हुए विदूषक
आकाश की ओर उड़ा॥१८४॥
आकाशमार्ग से जाकर राजकन्या को उसके भवन में पहुँचाकर और उसे धीरज बँधाकर
बोला—'सबेरे आकाश में उड़ने की मेरी शक्ति न रहेगी। यह केवल इसी रात के लिए
प्राप्त थी। तब इस घर से निकलते हुए मुझे सब लोग देखेंगे। इसलिए मैं अभी ही जा रहा
हूँ' ॥१८५ १८६॥
विदूषक के भलीभाँति समझाने पर भी डरती हुई बालिका उससे बोली—'तुम्हारे जाने
पर भय से काँपते हुए मेरे प्राण अब निकल रहे हैं। इसीलिए हे महापुरुष ! तुम न जाओ। स्वीकार
किये हुए कार्य का निर्वाह करना सज्जनों का स्वाभाविक व्रत (नियम) है ॥१८७-१८८॥
यह सुनकर महा प्राणवान् विदूषक सोचने लगा—'जो भी हो मैं नहीं जाता। यह
भय से प्राणों को छोड़ देगी। तब मेरी राज-सेवा ही क्या हुई ? । ऐसा सोचकर वह वहीं
राजकन्या के भवन में ठहर गया। धीरे-धीरे श्रम और जागरण से थका हुआ वह रात
में भी सो गया। किन्तु डरी हुई राजकुमारी ने जाग करके ही सारी रात व्यतीत की
॥१८९ १९१॥
'यह कुछ देर विश्राम कर ले'—इस प्रकार स्नेहपूर्ण-हृदया राजकन्या ने उसे प्रातःकाल
नहीं जगाया। तब रनिवास की सेविकाओं ने अन्दर आकर उसे देखा और घबराकर राजा से
निवेदन किया ॥१९२-१९३॥
राजा ने भी तत्त्व जानने की इच्छा से अपने निजी सेवक को भेजा। उसने अन्दर आकर
उस विदूषक को देखा॥१९४॥