Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

Page 364 of 876

Read in context
Page 364

तृतीय लम्बक ३२३
तलवार की मार से बैताल मुर्दों को छोड़कर भाग गये बैतालों का पावेश हट जाने
पर विद्रूपक ने उन तीनों चोरों की नाक काट ली और उन्हें एक वस्त्र-खण्ड में बाँध
लिया ।।१५१।।
वहाँ से लौटते हुए विद्रूपक ने श्मशान में मुर्दे पर बैठकर जप करते हुए एक प्रव्राजक (साधु)
को देखा ।।१५२।।
विद्रूपक उसकी चेष्टा और कार्यक्रम देखने की लालसा से उसकी पीठ की ओर आकर
छिप गया ।।१५३।।
कुछ ही समय के अनन्तर मुर्दे ने साबर के नीचे फूत्कार किया उसके मुंह से अग्नि की
ज्वाला और नाभि से सरसों निकले ।।१५४।।
साधक संन्यासी ने सरसों के उन दानों को हाथ में ले लिया और उठकर मुर्दे को थप्पड़
मारा ।।१५५।।
तदनन्तर वैताल से आविष्ट वह मुर्दा उठा और वह साधक उसके ही कन्धे पर
बैठ गया। उसपर चढ़कर वह सहसा चलने लगा तो कौतूहलवश विद्रूपक भी छिपे-छिपे उसकी
पीठ के पीछे चला। कुछ ही दूर जाने पर साधु, दुर्गा की मूर्तिवाले शून्य मन्दिर के अन्तर्गृह में
गया और वह वैतालवाला शव भूमि पर गिर गया ।।१५६-१५९।।
विद्रूपक भी मूर्ति से छिपकर उसकी गति-विधि देखता रहा। साधक ने देवी की पूजा
करके प्रार्थना की—हे देवि यदि तुम मुझपर प्रसन्न हो तो मुझे मेरा इच्छित वर प्रदान करो।
नहीं तो मैं अपना बलिदान करके तुम्हें प्रसन्न करता हूँ ।।१६०-१६१।।
उस कठोर सङ्कल्पभावना से पवित्र उस साध को उस गर्भगृह से निकली हुई वाणी ने
कहा—'राजा दाशिद्यसेन की लड़की को लाकर उसका बलिदान करो तो तुम अपना अभीष्ट
प्राप्त कर सकते हो' ।।१६२-१६३।।
यह सुनकर उस साधक ने बाहर निकल कर उस मुर्दे को फिर थप्पड़ लगाकर जगाया
और वह नृत्य करने लगा ।।१६४।।