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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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१२२ कथासरित्सागर
तत्रापश्यत्कन्यकाविशालनेत्रां स भामिनीम् ।
तस्यां परमं बद्ध्वा च कृतो जगद् वाममि ॥५१॥
आगच्छन्त्य दर्पोव शपम्योपरि सस्थितम्
प्रद्याज दमगानत्र जपन्' म विदूषक ॥५२॥
तस्यष्णोवनवागानुकादुपगम्य तम् ।
प्रच्छन्न पृच्छन्नम्य तस्यो प्रद्याजगम्य म ॥५३॥
क्षणात् प्रद्याजगम्याप पूवाग मुसवागश ।
निर्गाप्य मुरागग्य उराका माभेच्य गरेणा ॥५४॥
गृणोता गगाम्तांग म परिग्राजगता ।
उपाय माद्यामाम शय गानिकतन तम् ॥५५॥
उत्रिग्म पोमाखनाणपिष्ठित शर ।
आगगा प मग्यप स्वग्य प्रद्याजरोज ग ॥५६॥
तगगन्ध गगा गनु प्रयुग ता ।
रिगार्ता म मजामग्यदगाणित ॥५७॥