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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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तृतीय लम्बक २९५
तब भौंहें चढ़ाकर आँखें तिरछी करके और बायें हाथ से उसे रोक कर सोमप्रभा ने
कहा—'हूँ! अब मैंने समझा वेश्या के यहाँ जाने के लिए तुमने यह रूप पहना है, अब तुम वहाँ
न जाओ मेरे पास आओ मैं तुम्हारी पत्नी हूँ' ॥१२८-१२९॥
रोमांच कंपन और व्याकुलता से भरी एवं मन्तरूपी दूत द्वारा प्रेरित उस सोमप्रभा के ये
वचन सुनकर गुहचन्द्र उसके कमरे में जाकर मन से भी दुर्लभ दिव्य मानकर सुख अनुभव
करने लगा ॥१३०-१३१॥
इस प्रकार मन्त्र-द्वारा सिद्ध की गई सप्रेम और दिव्य स्थिति को छोड़कर रहती हुई
सोमप्रभा को उसे प्राप्त कर गुहचन्द्र सुखपूर्वक रहने लगा ॥१३२॥
इस प्रकार यज्ञ दान आदि शुभ कर्मों के प्रभाव से दिव्यता को प्राप्त कर शाप-भ्रष्ट
होने के कारण स्त्रियाँ गृहिणी का पद प्राप्त करती हैं ॥१३३॥
देवता और ब्राह्मणों की पूजा सज्जनों के लिए कामधेनु के समान है। उससे क्या प्राप्त
नहीं होता ? अर्थात् सब कुछ प्राप्त होता है। जिस प्रकार आँधी अत्यन्त ऊँचे दिव्य स्थान पर
जन्म लेनेवाले पुष्पों के अधःपात का कारण होती है, उसी प्रकार तुम्हारे लिए पाप-कर्म अधःपात
के कारण होते हैं॥१३४-१३५॥
राजकुमारी से इस प्रकार कहा गया विदूषक वसन्तक बोला—इस प्रसंग में मैंने
अहल्या की कथा सुनी है सुनो ॥१३६॥
इन्द्र और अहल्या की कथा
प्राचीन युग में त्रिकालज्ञ गौतम नामक एक महामुनि थे। अप्सराओं से भी अधिक
रूपवती अहल्या नाम की उनकी पत्नी थी ॥१३७॥
एक बार उसकी सुन्दरता पर मोहित हो इन्द्र ने उससे एकान्त की प्रार्थना की क्योंकि
वैभव से अन्धे राजाओं की बुद्धि अनुचित कार्यों की ओर दौड़ जाती है। इन्द्र को चाहती
हुई उस मूर्खा ने उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया तप के प्रभाव से इस बात को
जानकर गौतम मुनि उसी समय वहाँ आ गये। उनके भय से इन्द्र ने उसी समय मार्जार
(बिल्ली) का रूप धारण कर लिया तदनन्तर गौतम ने अहल्या से पूछा कि यहाँ कौन है?
उसने अपभ्रंश भाषा में सत्य का ध्यान रखते हुए कहा यह 'मज्जार' है। हँसते हुए मुनि ने
कहा कि सचमुच यह तुम्हारा जार है ऐसा कहकर मुनि ने उसे शाप दिया परन्तु उसने सत्य
का ध्यान रखते हुए छल से कहा था इसलिए मुनि ने उसके शाप का अन्त भी
कहा ॥१३८-१४१॥
१ अपभ्रंश भाषा में मार्जार (बिल्ली) का रूप 'मज्जार' होता है और संस्कृत में
उसका अर्थ; 'मत् = मेरा, जार = यार यह अर्थ होता है। अतः अहल्याने अपभ्रंश भाषा में
जो असत्य कहा था संस्कृत भाषा में वह सत्य होगया कि 'मेरा जार' है ॥