कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
Page 334 of 876
Read in contextतृतीय लम्बक २१५
उस समय एक समान सौन्दर्यवाली उन दोनों कन्याओं को एक साथ बैठे देखकर
गुहचन्द्र को वह रात तीन चन्द्र वाली दीखती थी॥१११॥
इस दृश्य को देखकर गुहचन्द्र सोचने लगा कि 'क्या यह स्वप्न है या भ्रम है अथवा
दोनों हैं। मेरे सन्मार्ग-वृक्ष की जो विदुषत्सङ्गति-रूपी मंजरी है, उसी में यह उचित फल देने
वाला पुष्पोद्गम हुआ है'। वह जब ऐसा सोच ही रहा था कि उन दोनों दिव्य कन्याओं ने अपने
योग्य भोजन करके आसव (मद्य) का पान प्रारम्भ किया। 'बहिन ! आज मेरे घर में कोई
अति तेजस्वी ब्राह्मण आया है। इस कारण मैं शंकित हो रही हूँ। अतः शीघ्र ही घर जाती हूँ।
ऐसा कहकर सोमप्रभा दूसरी से पूछकर वृक्ष पर से नीचे उतरी ॥११२-११६॥
यह सब कुछ देखते हुए भ्रमर के रूप में विद्यमान गुहचन्द्र और ब्राह्मण पहले ही घर
पर आकर रात में पहले के समान सो गये ॥११७-११८॥
तब उस ब्राह्मण ने प्रसन्नतापूर्वक गुहचन्द्र से कहा कि 'देखा तुमने यह तुम्हारी पत्नी
देव-जाति की है मनुष्य-जाति की नहीं। उसकी दूसरी बहिन को भी तुमने देख लिया
अतः दिव्य स्त्री मनुष्य के साथ संबंध कैसे चाहेगी ? इसलिए इसकी सिद्धि के लिए मैं तुम्हें
द्वार पर लिखने योग्य मन्त्र बताता हूँ। उसका प्रभाव बढ़ानेवाले बाहरी उपचार (उपाय)
भी तुम्हें बताता हूँ। जैसे आग अकेले ही जलती है और जलाने की शक्ति रखती है, यदि उसे
वायु मिल जाय तो क्या कहना ? उसी प्रकार अकेला मन्त्र ही सिद्धि प्रदान करता है यदि
उसके साथ और उपाय भी किये जायें तो फिर क्या कहना है? ऐसा कह कर, गुहचन्द्र को
मन्त्र बताकर और उसकी युक्ति समझाकर वह ब्राह्मण प्रातःकाल ही अन्तर्धान हो
गया ॥११९-१२३॥
गुहचन्द्र ने भी पत्नी के गृह-द्वार पर वह मन्त्र लिख दिया और सायंकाल ब्राह्मण के बताये
उपाय का प्रयोग किया। तदनन्तर गुहचन्द्र अपनी पत्नी के देखते-ही-देखते खूब सजधज के साथ
किसी वेश्या से वार्तालाप करने लगा ॥१२४-१२५॥
उस वेश्या को देखकर मन्त्र के प्रभाव से भीत सोमप्रभा ने गुहचन्द्र को बुलाकर ईर्ष्या
के साथ पूछा कि यह कौन है ? गुहचन्द्र ने उससे झूठ ही कहा कि 'यह एक वेश्या है जो मुझसे प्रेम
करती है और मैं भी इससे प्रेम करता हूँ अब उसी के घर जा रहा हूँ' ॥१२६-१२७॥