कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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अपनी अनुपम कान्ति से प्रसूति-गृह को आलोकित करती हुई वह कन्या उत्पन्न होते ही
स्पष्ट वाणी में वार्तालाप करने लगी और उठने-बैठने लगी ॥६६॥
कन्या की इस स्थिति से चकित और व्याकुल स्त्रियों का कोलाहल सुनकर डरता हुआ
धर्मगुप्त प्रसूतिगृह में आया। धर्मगुप्त ने आकर प्रणाम करने के अनन्तर उसी समय एकान्त में
उस कन्या से पूछा—'हे देवि ! तू कौन मेरे घर में अवतीर्ण हुई है ? ॥६७-६८॥
वह कन्या बोली—'तू मुझे किसी को देना नहीं मैं तेरे घर में रहकर ही कल्याण करता
रहूँगी' ॥६९॥
यह सुनकर भयभीत बनिये ने उस कन्या को घर में ही छिपाकर रख दिया और
बाहर उसके मर जाने की घोषणा कर दी। इस प्रकार सोमप्रभा नाम की वह कन्या
मनुष्य-शरीर और दिव्य कान्ति के साथ क्रमशः घर में ही बढ़ने लगी ॥७०॥
अपने घर की खिड़की से एक बार प्रमत्तता के कारण बसन्तोत्सव देखती हुई उस कन्या
का मुकुटभद्र नामक वैश्यपुत्र ने देख लिया ॥७१॥
लगे हुए कामदेव के भाले की नोक के समान हृदय में धँसी हुई उसे देखकर वह
मूर्च्छित-सा हो गया और अत्यन्त कठिनता से घर पहुँच सका ॥७२॥
काम-वेदना से अत्यन्त अस्वस्थ उस मुकुटभद्र ने अत्यन्त आग्रह करने पर, अपनी
अस्वस्थता के कारण अपने मित्र के द्वारा माता-पिता को कहवाया ॥७३॥
तब उसका पिता पुत्र-स्नेह के कारण उस कन्या की मँगनी करने के लिए धर्मगुप्त
के घर पर गया ॥७४॥
इस प्रकार अपनी बहू बनाने के लिए कन्या की प्रार्थना करते हुए शूरसेन को धर्मगुप्त
ने यह कहकर निराश कर दिया कि 'मेरे यहाँ कन्या कहाँ है ? वह तो होकर मर गई' ॥७५॥
शूरसेन ने कन्या को घर में छिपाये हुए धर्मगुप्त को और कामज्वर से पीड़ित अपने पुत्र
को देखकर शूरसेन ने सोचा—'मैं इस विषय में राजा से सहायता लेता हूँ, उसे प्रेरित करता हूँ
क्योंकि मैं बहुत राजा की सेवा कर चुका हूँ। राजा अवश्य ही मेरे मरणासन्न पुत्र को कन्या दिला
देगा ॥७६-७८॥
ऐसा निर्णय करके और एक उत्कोच राजा को भेंट करके उसने राजा से अपनी इच्छा
प्रकट की ॥७९॥