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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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तृतीय लम्बक २७७
घने मेघों के गर्जन के समान चारों दिशाओं को गुंजित करनेवाली आकाशवाणी को,
मोरों के समान ऊँची गर्दन किये हुए उन सब लोगों ने सुना ॥१२१॥
गोपालक के साथ राजा उदयन ने यौगन्धरायण के कार्य की प्रशंसा की और समस्त पृथ्वी
को अपने अधीन माना ॥१२२॥
परमसुखी वत्सराज मूर्तिमान् रति और निर्वृति (सुख)-स्वरूप और निरन्तर सहवास
के कारण परस्पर अनुरक्त उन दोनों पत्नियों के साथ अत्यन्त सुख का अनुभव करने
लगा ॥१२३॥
महाकवि श्रीसोमदेव भट्ट-रचित कथासरित्सागर के लावानक लम्बक का
द्वितीय तरंग समाप्त
तृतीय तरंग
वत्सराज की कथा (चालू)
किसी एक दिन एकान्त में वत्सराज ने वासवदत्ता और पद्मावती के साथ पान क्रीड़ा
करके गोपालक रुमण्वान् और वसन्तक के साथ यौगन्धरायण को बुलाया और गुप्त गोष्ठी करने
लगा ॥१-२॥
उस अवसर पर अपने विरह के प्रसंग में वत्सराज ने उन सब के सुनते रहने पर यह कथा
कहना प्रारम्भ किया ॥३॥
पुरूरवा और उर्वशी की कथा
प्राचीन युग में परमवैष्णव (विष्णु-भक्त) पुरूरवा नाम का राजा था। पृथ्वी के
समान स्वर्ग में भी उसकी बे-रोक-टोक गति थी ॥४॥
एक बार नन्दन-उद्यान में घूमते हुए उसे उर्वशी अप्सरा ने देखा जो कामदेव के
सम्मोहन नामक दूसरे अस्त्र के समान थी ॥५॥
पुरूरवा को देखते ही उर्वशी संज्ञाहीन (बेहोश) हो गई। उसके कारण रम्भा आदि
उसकी सखियों का हृदय काँपने लगा ॥६॥
राजा पुरूरवा भी लावण्य-रस की निर्झरिणी के समान उर्वशी को देखकर भी जो उसका
सान्निध्य प्राप्त न कर सका उस प्यास से मानो मूर्च्छित हो गया ॥७॥