कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
DevanagariHindipublished876 pages
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तृतीय लम्बक १५९
उसे एकान्त में समीप आई हुई देखकर उन काम-मोहित दोनों असुरों ने उसे दोनों
बाहुओं से पकड़ा। उसे अपनी-अपनी ओर खींचते हुए वे दोनों परस्पर लड़ पड़े और नष्ट हो
गये' ॥१३९-१४०॥
इस प्रकार स्त्री किसके लिए विपत्तियों का कारण नहीं बनती। तुम बहुतों की एक ही
प्यारी स्त्री द्रौपदी है॥१४१॥
इसको लेकर होनेवाले आपसी कलह से तुमलोगों को बचना चाहिए। मेरे कहने से
आप लोग उसका एक नियम निर्धारण कर लें ॥१४२॥
बड़े भाई के पास गई हुई उसे छोटे भाई, माता के समान समझें और छोटे भाइयों के
समीप जाने पर बड़ा भाई उसे बहू (पुत्र-वधू) के समान समझें। हे राजन् ! शुभ बुद्धि वाले तुम्हारे
परदादों ने मेरे वचन को उसी प्रकार स्वीकार कर लिया। वे लोग मेरे मित्र थे मैं तुम्हारे पास
उसी प्रेम से तुम्हें देखने आया हूँ और यह कहता हूँ सुनो ॥१४३-१४५॥
जैसे तुम मेरी बात को मानते हो उसी प्रकार अपने मंत्रियों की बात को भी
मानना। इस प्रकार तुम शीघ्र ही महान् ऐश्वर्य प्राप्त करोगे ॥१४६॥
कुछ समय तक तुम्हें कष्ट होगा उस समय तुम अधिक मोह न करना क्योंकि यह दुःख
सुखान्त होगा अर्थात् अन्त में सुख मिलेगा ॥१४७॥
'आप जो कहते हैं ठीक है' वत्सराज के ऐसा कहने पर भावी अभ्युदय के चिह्नों की
सूचना देने में विशारद नारद मुनि अन्तर्धान हो गये ॥१४८॥
यौगन्धरायण आदि सभी राज-मन्त्री मुनिप्रवर नारद के वचनों से अपनी योजना की
सफलता समझ कर उसे कार्यान्वित करने का प्रयत्न करने लगे ॥१४९॥
महाकवि सोमदेव भट्ट-विरचित कथा सरित्सागर के लावानक लम्बक का
प्रथम तरंग समाप्त।
१ यह कथा महाभारत के आदि पर्व में भी आती है।