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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 204

द्वितीय लम्बक १६३
ऐसा सोचकर चंडमहासेन उस कार्य की सिद्धि के लिए चंडिका के मन्दिर में गया और
वहाँ उसने पूजा तथा स्तुति करके मन्नत मानी ॥१३॥
चंडिका-मन्दिर में राजा ने आकाशवाणी सुनी कि 'हे राजन्! तुम्हारी यह अभिलाषा
पूर्ण होगी ॥१४॥
प्रसन्नचित राजा ने चंडिका-मन्दिर से लौटकर बुद्धिला नामक मन्त्री से इस विषय पर
विचार-विमर्श किया ॥१५॥
राजा ने कहा—'राजा उदयन उच्च आत्माभिमानी निर्भीक अनुगत अनुचरोंवाला
और महाबल (सेना) वान् है! वह साम दाम भेद दंड आदि नीतियों के वश में आनेवाला
नहीं है, उसे शान्ति से ही वश में करना चाहिए ॥१६॥
मन्त्री के साथ इस प्रकार विचार करके राजा ने एक दूत को राजा उदयन के पास भेजा
और यह सन्देश दिया कि तुम मेरे वचनानुसार वत्सराज के पास जाकर यह कहो कि मेरी पुत्री
तुझसे संगीत-विद्या सीखना चाहती है। यदि तुम्हें हमारे प्रति स्नेह है तो तुम उसे यहाँ आकर
शिक्षा दो ॥१७-१८॥
इस प्रकार उस सन्देश के साथ भेजे हुए दूत ने कौशाम्बी नगरी में जाकर अपने स्वामी
का सन्देश वत्सराज उदयन से कह सुनाया ॥१९॥ उदयन ने दूत से उज्जयिनी-नरेश के इस
अनुचित सन्देश को सुनकर एकान्त में मन्त्री यौगन्धरायण से कहा ॥२०॥
'इस कहने में मुझे यह कैसा साभिमान सन्देश भेजा है। तथा सन्देश देते हुए उस दूत
का क्या अभिप्राय है। वत्सराज के ऐसा कहने पर स्वामी के हित में सुदृढ़ और सतर्क
यौगन्धरायण मन्त्री ने राजा से कहा॥ १२१॥