कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- २० -
बृहत्कथाएं सुनाई। इतना करने के बाद वह शापमुक्त होकर स्वर्ग चला गया। उसके भाई माल्य-
वान् ने भी मृत्युलोक में प्रतिष्ठान पुरी में गुणाढ्य के रूप में जन्म लिया और वह वहाँ के राजा
सातवाहन का मंत्री बना। गुणदेव और नन्दिदेव उसके दो शिष्य थे। उन्हें लेकर वह काणभूति
के पास आया। वहाँ काणभूति से उसे पिशाच भाषा में सात बृहत्कथाएं प्राप्त हुईं और उसने
प्रत्येक को एक-एक लाख श्लोकों में अपने रक्त से लिखा। अपने शिष्यों की सलाह से उसने उन्हें
राज सातवाहन के पास इस विचार से भेजा कि राजा उनकी रक्षा करेगा। पर पिशाचों की भाषा
में लिखी हुई कहानियों को राजा ने पसन्द नहीं किया। इस समाचार से गुणाढ्य को बहुत दुःख
हुआ और उसने अपनी छः कहानियां जला डालीं। अपने शिष्यों का अनुरोध मानकर केवल
सातवीं कहानी बची रहने दी। उस कथा को सुनकर जंगल के जीव भी मोहित हो गए। जब
राजा सातवाहन को यह ज्ञात हुआ तब उसे पश्चात्ताप हुआ और उसने गुणाढ्य के स्थान पर जाकर
बचे हुए कथाभाग को उससे ले लिया। उसने गुणदेव और नन्दिदेव की सहायता से उसका
अध्ययन किया और कथा की उत्पत्ति का वर्णन करनेवाला अंश स्वयं उसमें जोड़ा।¹
नेपाल-माहात्म्य (अध्याय २७-२९) में इस कहानी का रूप थोड़ा भिन्न है। आरंभ में
शिव-पार्वती के संवाद का उल्लेख है। पार्वती ने शिव से नई कहानी सुनाने की प्रार्थना की। शिव
एकान्त में सब द्वार बन्द करके सुनाने लगे। पर उनके भुङ्गी नामक गण ने भौरे का रूप रखकर और
भीतर जाकर वे कहानियां सुन लीं और अपनी पत्नी विजया को उन्हें सुना दिया। किसी दिन
जब पार्वती ने कहानियां अपनी सखियों को सुनाने लगीं तो विजया को वे पहले से ज्ञात थीं।
पार्वती ने यह जानना चाहा कि किसने यह अपराध किया था। शिव ने ध्यान धरकर देखा और
भुङ्गी को शाप दिया। भुङ्गी ने क्षमा-याचना की। तब शिव ने क्षमा करते हुए कहा—इसे मर्त्यलोक
में जन्म लेना होगा और सुनी हुई कथाओं को नौ लाख श्लोकों में लिखना होगा। फिर उसे एक लिंग
की प्रतिष्ठा करनी होगी और तब वह कैलास को लौटने का अधिकारी होगा। इस उल्लेख से
भी ज्ञात होता है कि बृहत्कथा मूल में एक शृंगार-कथा थी। पर नेपाल-माहात्म्य के इस उल्लेख
में कथा का सुननेवाला भुङ्गी नामक गण था। भुङ्गी ने गुणाढ्य के रूप में मथुरा में जन्म लिया।
वह बचपन में अनाथ हो गया और तब उज्जयिनी चला आया। उज्जयिनी में मदन नामक राजा
राज्य करते थे उनकी रानी लीलावती गौड़देश के राजा की पुत्री थी। उज्जयिनी में सर्ववर्मन्
नाम के महान् पण्डित राजसभा में थे। वे गुणाढ्य की प्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्होंने उसे
भी राजा की सभा का सदस्य बनवा दिया। एक दिन राजा अपनी रानियों के साथ जल-विहार
कर रहा था। तब उसने 'मोदक' शब्द का अशुद्ध प्रयोग किया। गुणाढ्य ने १२ वर्ष में उसे
व्याकरण की शिक्षा देने की बात कही। पर सर्ववर्मन ने केवल दो ही वर्षों में उसे व्याकरण में
पण्डित बना देने को कहा। गुणाढ्य और सर्ववर्मन में इसके लिए स्पर्द्धा हुई, और सर्ववर्मन ने
कलाप-व्याकरण की रचना करके दो ही वर्षों में राजा को व्याकरण का ज्ञान करा दिया। गुणाढ्य
१ कृष्णमाचार्य संस्कृत-साहित्य का इतिहास पृष्ठ ४१४-४१५।