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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 122

प्रथम लम्बक ८७
राजा सातवाहन की कथा
तब गुणाढ्य ने कहा कि यह भी सुनो ! प्राचीन समय में दीपकणि नामक प्रसिद्ध पराक्रमी
राजा हुआ ॥८८॥
उसकी प्राणों से भी प्यारी शक्तिमती नाम की रानी थी। किसी समय रतिकाल के
अन्त में उद्यान में सोई हुई रानी को साँप ने काट लिया ॥८९॥
उससे अत्यधिक प्यार करनेवाले राजा ने उसके मर जाने पर, सन्तान-रहित होने पर
भी ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने का निश्चय किया ॥९०॥
किसी समय राज्य के योग्य पुत्र के न होने से अत्यन्त दुःखी राजा को भगवान् चन्द्रशेखर
ने स्वप्न में आदेश दिया—॥९१॥
'किसी समय जंगल में घूमते हुए सिंह पर चढ़े हुए बालक को तुम देखोगे, उस सवार घर
लाना वह तुम्हारा पुत्र होगा' ॥९२॥
जागकर उठे हुए राजा ने स्वप्न का स्मरण करते हुए प्रसन्नता प्रकट की। किसी दिन राजा
शिकार के सिलसिले में जंगल में दूर तक निकल गया ॥९३॥
जंगल में भ्रमण करते हुए राजा ने मध्याह्न के समय एक पद्म-सरोवर के किनारे शेर
पर चढ़े हुए सूर्य के समान तेजस्वी एक बालक को देखा ॥९४॥
इसके अनन्तर राजा ने स्वप्न का स्मरण करते हुए बालक को उतारकर पानी पीते
हुए सिंह को एक बाण मारा ॥९५॥
बाण लगते ही सिंह अपना शरीर छोड़कर तुरन्त पुरुष बन गया। उसे देखकर राजा ने
पूछा कि 'तुम्हें यह कष्ट कैसे हुआ' ॥९६॥
सिंह बोला—"मैं कुबेर का मित्र सात नामक यक्ष हूँ ! मैंने एक बार स्नान करती हुई
एक ऋषि-कन्या को देखा। देखते ही वह और मैं दोनों परस्पर आसक्त हो गये। उसे गान्धर्व
विवाह द्वारा मैंने पत्नी बना लिया ॥९७॥
ऋषिकन्या के बन्धुओं ने यह जानकर उसे और मुझे दोनों को शाप दिया कि तुम दोनों
पापी स्वेच्छाचारी सिंह बनोगे ॥९८॥
ऋषियों ने उस कन्या को पुत्र उत्पन्न होने तक शाप की अवधि दी और मुझे तुम्हारे बाण
का आघात लगने तक की ॥९९॥
तदनन्तर हम दोनों सिंह की जोड़ी बन गये। कुछ समय बाद वह (सिंहनी)
गर्भवती हुई और इस बालक के उत्पन्न होने पर मर गई। मैंने इस बालक को अन्यान्य
सिंहनियों के दूध से पाला है। आज तुम्हारे बाण के आघात से मैं भी शाप से छूट
गया हूँ ॥१००॥