कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished182 pages
Page 79 of 182
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वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६७
अशरीरँ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥
जो शरीरोंमें शरीररहित तथा अनित्योंमें नित्यस्वरूप है उस महान् और सर्वव्यापक आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ २२ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अशरीरं स्वेन रूपेण आकाशकल्प आत्मा तमशरीरं शरीरेषु देवपितृमनुष्यादिशरीरेषु अनवस्थेष्ववस्थितिरहितेष्ववस्थितं नित्यमविकृतमित्येतत्, महान्तं महत्त्वस्यापेक्षिकत्वशङ्कायामाह— विभुं व्यापिनमात्मानम्—आत्मग्रहणं स्वतोऽनन्यत्वप्रदर्शनार्थम्, आत्मशब्दः प्रत्यगात्मविषय एव मुख्यस्तमीदृशमात्मानं मत्वा अयमहमिति धीरो धीमान्न शोचति। न ह्येवंविधस्यात्मविदः शोकोपपत्तिः ॥ २२ ॥ | आत्मा अपने स्वरूपसे आकाशके समान है, अतः देव, पितृ और मनुष्यादि शरीरोंमें अशरीर है, अनवस्थित—अवस्थितिरहित यानी अनित्योंमें अवस्थित—नित्य अर्थात् अविकारी है, तथा महान् है—[किससे महान् है—इस प्रकार] महत्त्वमें इतरकी अपेक्षा होनेकी शङ्का करके कहते हैं उस विभु अर्थात् व्यापक आत्माको जानकर—यहाँ 'आत्मा' शब्द अपनेसे ब्रह्मकी अभिन्नता दिखानेके लिये लिया गया है, क्योंकि 'आत्मा' शब्द प्रत्यगात्मविषयमें ही मुख्य है—ऐसे उस आत्माको 'यही मैं हूँ' ऐसा जानकर धीर—बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता, क्योंकि इस प्रकारके आत्मवेत्तामें शोक बन ही नहीं सकता ॥ २२ ॥ |
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| यद्यपि दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा तथाप्युपायेन सुविज्ञेय एवेत्याह— | यद्यपि यह आत्मा दुर्विज्ञेय है तो भी उपाय करनेसे तो सुविज्ञेय ही है; इसपर कहते हैं— |