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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

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Page 78
६६कठोपनिषद्[ अध्याय १

| अस्मदादेरेव सूक्ष्मबुद्धेः पण्डितस्य सुविज्ञेयोऽयमात्मा स्थितिगतिनित्यानित्यादिविरुद्धानेकधर्मोपाधिकत्वाद्विरुद्धधर्मवत्त्वाद्विश्वरूप इव चिन्तामणिवदवभासते। अतो दुर्विज्ञेयत्वं दर्शयति कस्तं मदन्यो ज्ञातुमर्हतीति। | यह आत्मा हम-जैसे सूक्ष्मबुद्धि विद्वानोंके लिये ही सुविज्ञेय है। स्थिति-गति तथा नित्य और अनित्य आदि अनेक विरुद्धधर्मरूप उपाधिवाला तथा विपरीतधर्मयुक्त होनेसे यह चिन्तामणिके समान विश्वरूप-सा भासता है। अतः 'मेरे सिवा उसे और कौन जानने योग्य है' ऐसा कहकर उसकी दुर्विज्ञेयता दिखलाते हैं। |
| कारणानामुपशमः शयनं करणजनितस्यैकदेशविज्ञानस्योपशमः शयानस्य भवति। यदा चैवं केवलसामान्यविज्ञानत्वात् सर्वतो यातीव यदा विशेषविज्ञानस्थः स्वेन रूपेण स्थित एव सन्मनआदिगतिषु तदुपाधिकत्वाद्दूरं व्रजतीव। स चेहैव वर्तते ॥ २१ ॥ | इन्द्रियोंका शान्त हो जाना शयन है। शयन करनेवाले पुरुषका इन्द्रियजनित एकदेशसम्बन्धी विज्ञान शान्त हो जाता है। जिस समय ऐसी अवस्था होती है उस समय केवल सामान्य विज्ञान होनेसे वह सब ओर जाता हुआ-सा जान पड़ता है; और जब वह विशेष विज्ञानमें स्थित होता है तो स्वरूपसे अविचल रहकर भी मन आदि उपाधियोंवाला होनेसे उन मन आदिकी गतियोंमें जाता हुआ-सा जान पड़ता है। वस्तुतः तो वह यहीं रहता है॥२१॥ |
| तद्विज्ञानाच्च शोकात्यय इत्यपि दर्शयति— | तथा अब यह भी दिखलाते हैं कि उस आत्माके ज्ञानसे शोकका अन्त हो जाता है— |