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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

Page 70 of 182

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Page 70
५८कठोपनिषद्[ अध्याय १

| इत्येवं पृष्टवते मृत्युरुवाच<br>पृष्टं वस्तु विशेषणान्तरं च<br>विवक्षन्— | इस प्रकार पूछते हुए नचिकेतासे,<br>पूछी हुई वस्तु तथा उसके अन्य<br>विशेषणको बतलानेकी इच्छासे<br>यमराजने कहा— |

ॐकारोपदेश

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति<br>
तपाꣳसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।<br>
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति<br>
तत्ते पदꣳसंग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥

सारे वेद जिस पदका वर्णन करते हैं, समस्त तपोंको जिसकी प्राप्तिके साधक कहते हैं, जिसकी इच्छासे [ मुमुक्षुजन ] ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं उस पदको मैं तुमसे संक्षेपमें कहता हूँ। 'ॐ' यही वह पद है ॥ १५ ॥

| सर्वे वेदा यत्पदं पदनीयं गमनीयमविभागेनामनन्ति प्रतिपादयन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति यत्प्राप्त्यर्थानीत्यर्थः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं गुरुकुलवासलक्षणमन्यद्वा ब्रह्मप्राप्त्यर्थं चरन्ति तत्ते तुभ्यं पदं यज्ज्ञातुम् इच्छसि संग्रहेण संक्षेपतो ब्रवीमि। | समस्त वेद जिस पद अर्थात् गमनीय स्थानका अविभाग यानी एक रूपसे आमनन—प्रतिपादन करते हैं, समस्त तपोंको भी जिसके लिये कहते हैं अर्थात् वे जिस स्थानकी प्राप्तिके लिये हैं, जिसकी इच्छासे गुरुकुलवासरूप ब्रह्मचर्य अथवा ब्रह्मप्राप्तिमें उपयोगी कोई और साधन करते हैं उस पदको, जिसे कि तू जानना चाहता है, मैं संक्षेपमें कहता हूँ। |