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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

Page 69 of 182

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Page 69

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७


यद्यहं योग्यः प्रसन्नश्चासि भगवन्मां प्रति—[ नचिकेता बोला—] भगवन् ! यदि मैं योग्य हूँ और आप मुझपर प्रसन्न हैं तो—

सर्वातीतवस्तुविषयक प्रश्न

अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥१४॥

जो धर्मसे पृथक्, अधर्मसे पृथक् तथा इस कार्यकारणरूप प्रपञ्चसे भी पृथक् है और जो भूत एवं भविष्यत्से भी अन्य है—ऐसा आप जिसे देखते हैं वही मुझसे कहिये ॥ १४ ॥

अन्यत्र धर्माच्छास्त्रीयाद्धर्मानुष्ठानात्तत्फलात्तत्कारकेभ्यश्च पृथग्भूतमित्यर्थः । तथान्यत्र अधर्मात्तथान्यत्रास्मात्कृताकृतात् कृतं कार्यमकृतं कारणमस्माद् अन्यत्र । किं चान्यत्र भूताच्चातिक्रान्तात्कालाद्भव्याच्च भविष्यतश्च तथा वर्तमानात्; कालत्रयेण यन्न परिच्छिद्यत इत्यर्थः । यद् ईदृशं वस्तु सर्वव्यवहारगोचरातीतं पश्यसि तद्वद मह्यम् ॥१४॥जो धर्म यानी शास्त्रीय धर्मानुष्ठान, उसके फल तथा [कर्ता-करण आदि] कारकोंसे अन्यत्र—पृथग्भूत है, तथा जो अधर्मसे भिन्न है और कृत—कार्य तथा अकृत—कारण इस प्रकार इस कार्य-कारण (स्थूल-सूक्ष्म प्रपञ्च) से भी पृथक् है, यही नहीं भूत अर्थात् बीते हुए भव्य—आगामी तथा वर्तमान कालसे भी अन्यत्र है; तात्पर्य यह है कि जो तीनों कालोंसे परिच्छिन्न नहीं है । ऐसी जिस सम्पूर्ण व्यवहारविषयसे अतीत वस्तुको आप देखते हैं वह मुझसे कहिये ॥१४॥