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सर्वकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४५


| अविद्यायामन्तरे मध्ये घनीभूत इव तमसि वर्तमाना वेष्ट्यमानाः पुत्रपश्वादितृष्णापाशशतैः । स्वयं वयं धीराः प्रज्ञावन्तः पण्डिताः शास्त्रकुशलाश्चेति मन्यमानास्ते दन्द्रम्यमाणा अत्यर्थं कुटिलामनेकरूपां गतिम् इच्छन्तो जरामरणरोगादिदुःखैः परियन्ति परिगच्छन्ति मूढा अविवेकिनोऽन्धेनैव दृष्टिहीनेनैव नीयमाना विषमे पथि यथा बहवोऽन्धा महान्तमनर्थमृच्छन्ति तद्वत् ॥५॥ | वे घनीभूत अन्धकारके समान अविद्याके भीतर स्थित हो पुत्र-पशु आदि सैकड़ों तृष्णापाशोंसे बँधे हुए [व्यवहारमें लगे रहते हैं] । जिस प्रकार अन्धे यानी दृष्टिहीन पुरुषसे विषम मार्गमें ले जाये जाते हुए बहुत-से अन्धे महान् अनर्थको प्राप्त होते हैं उसी प्रकार 'हम बड़े धीर यानी बुद्धिमान् हैं और पण्डित अर्थात् शास्त्रकुशल हैं' इस प्रकार अपनेको माननेवाले वे मूढ़—अविवेकी पुरुष नाना प्रकारकी अत्यन्त कुटिल गतियोंकी इच्छा करते हुए जरा, मरण और रोगादि दुःखोंसे सब ओर भटकते रहते हैं ॥ ५ ॥ |
| अत एव मूढत्वात्— | अतएव मूढ़ताके कारण— |

न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥

धनके मोहसे अन्धे हुए और प्रमाद करनेवाले उस मूर्खको परलोकका साधन नहीं सूझता । यह लोक है, परलोक नहीं है—ऐसा माननेवाला पुरुष बारम्बार मेरे वशको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥