कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in context| ४२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| यस्तु मन्दोऽल्पबुद्धिः स विवेकासामर्थ्याद्योगक्षेमाद्योग-क्षेमनिमित्तं शरीराद्युपचयरक्षण-निमित्तमित्येतत्प्रेयः पशुपुत्रादि-लक्षणं वृणीते ॥ २ ॥ | इसके विपरीत जो मन्द—अल्प बुद्धि है वह, विवेकशक्तिका अभाव होनेके कारण, जो योग-क्षेमका ही कारण है अर्थात् जो शरीरादिकी वृद्धि और रक्षाका ही निमित्त है उस पशु-पुत्रादिरूप प्रेयको ही वरण करता है ॥ २ ॥ |
स त्वं प्रियान्प्रियरूपांश्च कामा-<br>
नभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।<br>
नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो<br>
यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥
हे नचिकेतः ! उस तूने पुत्र-वित्तादि प्रिय और अप्सरा आदि प्रियरूप भोगोंको, उनका असारत्व चिन्तन करके, त्याग दिया है और जिसमें बहुत-से मनुष्य डूब जाते हैं उस इस धनप्राया निन्दित गतिको तू प्राप्त नहीं हुआ ॥ ३ ॥
| स त्वं पुनःपुनर्मया प्रलोभ्य-मानोऽपि प्रियान् पुत्रादीन् प्रियरूपांश्चाप्सरःप्रभृतिलक्षणान् कामानभिध्यायंश्चिन्तयंस्तेषाम् अनित्यत्वासारत्वादिदोषान् हे नचिकेतोऽत्यस्राक्षीरतिसृष्टवान् परित्यक्तवानस्यहो बुद्धिमत्ता तव। नैतामवाप्तवानसि सृङ्कां सृतिं कुत्सितां मूढजनप्रवृत्तां | हे नचिकेतः ! तेरी बुद्धिमत्ता धन्य है; जिस तूने कि मेरे द्वारा बारम्बार प्रलोभित किये जानेपर भी पुत्रादि प्रिय तथा अप्सरा आदि प्रियरूप भोगोंको, उनकी अनित्यता और असारता आदि दोषोंका विचार करके परित्याग कर दिया, और जिसमें मूढ़ पुरुष प्रवृत्त हुआ करते हैं उस वित्तमयी—धनप्राया निन्दित गतिको तू प्राप्त नहीं |
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