कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished182 pages
Page 53 of 182
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वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत-
स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते
प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥ २ ॥
श्रेय और प्रेय [परस्पर मिले हुए-से होकर] मनुष्यके पास आते हैं। उन दोनोंको बुद्धिमान् पुरुष भली प्रकार विचारकर अलग-अलग करता है। विवेकी पुरुष प्रेयके सामने श्रेयको ही वरण करता है; किन्तु मूढ योग-क्षेमके निमित्तसे प्रेयको वरण करता है ॥ २ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| सत्यं स्वायत्ते तथापि साधनतः फलतश्च मन्दबुद्धीनां दुर्वि्वेकरूपे सती व्यामिश्रीभूते इव मनुष्यमेतं पुरुषमा इतः प्राप्नुतः श्रेयश्च प्रेयश्च। अतो हंस इवाम्भसः पयस्तौ श्रेयःप्रेयःपदार्थौ सम्परीत्य सम्यक्परिगम्य मनसालोच्य गुरुलाघवं विविनक्ति पृथक्करोति धीरो धीमान् । विविच्य च श्रेयो हि श्रेय एवाभिवृणीते प्रेयसोऽभ्यर्हितत्वात् । कोऽसौ धीरः । | वे मनुष्यके अधीन हैं—यह बात ठीक है। तथापि वे श्रेय और प्रेय मन्दबुद्धि पुरुषोंके लिये साधन और फलदृष्टिसे जिनका पार्थक्य करना बहुत कठिन है ऐसे होकर परस्पर मिले हुएसे ही मनुष्य यानी इस जीवको प्राप्त होते हैं। अतः हंस जिस प्रकार जलसे दूध अलग कर लेता है उसी प्रकार धीर—बुद्धिमान् पुरुष उन श्रेय और प्रेय पदार्थोंका भली प्रकार परिगमन कर—मनसे उनकी आलोचना कर उनके गौरव और लाघवका विवेक यानी पृथक्करण करता है। इस प्रकार श्रेयका विवेचन कर वह प्रेयकी अपेक्षा अधिक अभीष्ट होनेके कारण श्रेयको ही ग्रहण करता हैं। परन्तु ऐसा करता कौन है? वही जो बुद्धिमान् है। |