कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished182 pages
Page 47 of 182
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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३५
| यदि नामास्माकं वित्ततृष्णा स्याल्लप्स्यामहे प्राप्स्यामह इत्येतद्वित्तमद्राक्ष्म दृष्टवन्तो वयं चेत्त्वा त्वाम्। जीवितमपि तथैव। जीविष्यामो यावद्याम्ये पदे त्वम् ईशिष्यसीशिष्यसे प्रभुः स्याः कथं हि मर्त्यस्त्वया समेत्याल्पधनायुर्भवेत्। वरस्तु मे वरणीयः स एव यदात्मविज्ञानम् ॥ २७ ॥ | अब, जब कि हम आपको देख चुके हैं तो, यदि हमें धनकी लालसा होगी तो, उसे हम प्राप्त कर ही लेंगे। इसी प्रकार दीर्घजीवन भी पा लेंगे। जबतक आप याम्यपदपर शासन करेंगे तबतक हम भी जीवित रहेंगे। भला कोई भी मनुष्य आपके सम्पर्कमें आकर अल्पायु या अल्पधन कैसे रह सकता है ? किन्तु वर तो वह जो आत्मविज्ञान है वही हमारा वरणीय है ॥ २७ ॥ |
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| यतश्च— | क्योंकि— |
अजीर्यताममृतानामुपेत्य<br>जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।<br>अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदा-<br>नतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥
कभी जराग्रस्त न होनेवाले अमरोंके समीप पहुँचकर नीचे पृथिवी-पर रहनेवाला कौन जराग्रस्त विवेकी मनुष्य होगा जो केवल शारीरिक वर्णके रागसे प्राप्त होनेवाले [ स्त्रीसम्भोग आदि ] सुखोंको [ अस्थिर रूपमें ] देखता हुआ भी अति दीर्घ जीवनमें सुख मानेगा ? ॥ २८ ॥
| अजीर्यतां वयोहानिमप्राप्नुवताममृतानां सकाशमुपेत्य उपगम्यात्मन उत्कृष्टं प्रयोजनान्तरं प्राप्तव्यं तेभ्यः प्रजानन् | वयोहानिरूप जीर्णताको प्राप्त न होनेवाले अमरों—देवताओं-की सन्निधिमें पहुँचकर उनसे प्राप्त होने योग्य अपने अन्य उत्कृष्ट प्रयोजनको—प्राप्तव्यको जानता—प्राप्त करता हुआ भी |
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