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सर्वकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 182 में से

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पृष्ठ 16
४कठोपनिषद्

योगादग्निविद्याप्युपनिषदित्युच्यते। तथा च वक्ष्यति—"स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते" (क० उ० १।१।१३) इत्यादि।अर्थके योगसे 'उपनिषद्' कही जाती है। "स्वर्गलोकको प्राप्त होनेवाले पुरुष अमरत्व प्राप्त करते हैं" ऐसा आगे कहेंगे भी।
ननु चोपनिषच्छब्देनाध्येतारो ग्रन्थमप्यभिलपन्ति। उपनिषदमधीमहेऽध्यापयाम इति च।शङ्का—किन्तु अध्ययन करनेवाले तो 'उपनिषद्' शब्दसे ग्रन्थका भी उल्लेख करते हैं, जैसे—'हम उपनिषद् पढ़ते हैं अथवा पढ़ाते हैं' इत्यादि।
एवं नैष दोषोऽविद्यादिसंसारहेतुविशरणादेः सदिधात्वर्थस्य ग्रन्थमात्रेऽसम्भवाद्विद्यायां च सम्भवात्। ग्रन्थस्यापि तादर्थ्येन तच्छब्दत्वोपपत्तेः, आयुर्वै घृतम् इत्यादिवत्। तस्माद्विद्यायां मुख्याया वृत्त्योपनिषच्छब्दो वर्तते ग्रन्थे तु भक्त्येति।समाधान—ऐसा कहना भी दोषयुक्त नहीं है। संसारके हेतुभूत अविद्या आदिके विशरण आदि, जो कि सद् धातुके अर्थ हैं, ग्रन्थमात्रमें तो सम्भव नहीं हैं किन्तु विद्यामें सम्भव हो सकते हैं। ग्रन्थ भी विद्याके ही लिये है; इसलिये वह भी उस शब्दसे कहा जा सकता है; जैसे [आयुवृद्धिमें उपयोगी होनेके कारण] 'घृत आयु ही है' ऐसा कहा जाता है। इसलिये 'उपनिषद्' शब्द विद्यामें मुख्य वृत्तिसे प्रयुक्त होता है तथा ग्रन्थमें गौणी वृत्तिसे।
एवमुपनिषन्निर्वचनेनैव विशिष्टोऽधिकारी विद्यायामुक्तः। विषयश्च विशिष्ट उक्तो विद्यायाः परंइस प्रकार 'उपनिषद्' शब्दका निर्वचन करनेसे ही विद्याका विशिष्ट अधिकारी बतला दिया गया। तथा विद्याका प्रत्यगात्मस्वरूप पर-