कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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कर्मयोग
कर्त्ता की फल में बुद्धि न होने से कर्म निष्फल नहीं हो जाता, प्रत्युत फल की आशा से जो कर्म किया जाता है, उसकी अपेक्षा उसमें हज़ार गुना फल देने की शक्ति हो जाती है। कठिनता यह है कि मनुष्य अधीर हो जाता है, जिस से दृढ़ता के साथ लगातार कर्म नहीं करता। मनुष्य की आध्यात्मिक दशा पर दृष्टिपात करने से भी निष्काम कर्म का मूल्य अधिक जँचता है। प्रेम, सत्यता और त्याग ये आत्मा के केवल बाह्य लिङ्ग नहीं हैं, किन्तु वास्तव में हमारे जीवन के सबसे उच्च आदर्श हैं। इनको धारण करने से हृदय के भाव शुद्ध और मानसिक शक्ति प्रबल होती है। जो मनुष्य निष्काम कर्म करेगा और मन को वश में रक्खेगा उसके कर्म बड़े प्रभावशाली होंगे। क्योंकि आत्म-संयम सम्पूर्ण बाह्य क्रियाओं से अधिक महत्व रखता है। कल्पना करो कि चार घोड़ों की गाड़ी बड़े वेग से दौड़ी चली जारही है; साईस घोड़ों को लगाम खींच कर रोक रहा है। बताइए किस में अधिक बल है ? घोड़ों के वेग से दौड़ने में या साईस के रोकने में ? एक गेंद हवा में उछल कर कुछ दूर जाती है फिर पृथिवी पर गिर पड़ती है। दूसरी दीवार से टकरा कर वहीं की वहीं रह जाती है। यही दशा समस्त सकाम और स्वार्थ के कर्मों की है। इन सब कर्मों का यह परिणाम होगा कि शीघ्र या देर में ये सब विलीन हो जावेंगे और फिर तुम्हारे पास लौट कर न आवेंगे। परन्तु यदि अपने मन को रोका जावे तो अपने आप आत्मा की शक्ति बढ़ेगी। निष्काम कर्म करना यथार्थ में अपने मन को रोकना है। इस प्रकार के संयम से आत्मा सुशिक्षित होता है और बुद्धि की जैसी प्रबल मानसिक शक्ति