कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
Page 17 of 115
Read in contextपहला अध्याय
११
समझ कर करे। प्रत्येक देश में ऐसे धर्मात्मा पुरुष होते हैं, जो न ख्याति के भूखे हैं न नाम के और न स्वर्ग की इच्छा रखते हैं; परन्तु कर्म बराबर करते रहते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि निष्काम कर्म का परिणाम सदा अच्छा ही होता है। ※ ऐसे मनुष्य भी संसार में वर्त्तमान हैं जो पवित्र और उच्च भावों को धारण किये हुए दीनोद्धार और परोपकार में अपने जीवन को लगाते हैं।
जो लोग प्रसिद्धि और बड़ाई के लिए कर्म करते हैं, उनको कर्म का फल देर में मिलता है। बहुधा हमको बड़ाई या नामवरी उस समय मिलती है, जब हम बूढ़े हो जाते हैं और जीवन लगभग मरणासन्न ही हो जाता है। यदि मैं अपने सारे आयु भर ख्याति के लिए कर्म करता रहूँ तो अन्त में देखूँगा कि मुझको बहुत ही कम लाभ हुआ है। इसी प्रकार और और प्रयोजनों के लोभ से जो कर्म करते हैं, उनकी भी यही दशा है। हाँ, जो बिना किसी प्रयोजन के कर्म करता है, उसका फल अनन्त और अमिट है। यदि कहो कि जब उसकी कोई इच्छा ही नहीं तो उसे क्या फल मिलेगा और न उसने फल के लिए कर्म किया है तो इसका उत्तर यह है कि
※वेद में भी जहां मनुष्य को यावज्जीवन कर्म करने की आज्ञा दी गई हैं वहाँ कर्म को केवल कर्म समझ कर ही करने की आज्ञा है। क्योंकि सकाम (किसी प्रयोजन या फल को लक्ष्य में रख कर) जो कर्म किये जाते हैं वे मनुष्य के सांसारिक बन्धनों के हेतु होते हैं। परन्तु जो कर्म निष्काम, बिना फल की आशा के, कर्म को केवल कर्त्तव्य समझ कर, किये जाते हैं (यद्यपि फल उनका भी होता है और कर्ता को भोगना भी पड़ता है, तथापि) वे मनुष्य के बन्धन के कारण नहीं हो सकते, प्रत्युत मुक्ति के लिए उपयोगी होते हैं।
२