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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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कर्मयोग

सिक शक्ति कहाँ से आई ? पैतृक अंश (क़ानून विरासत) से कभी इस प्रश्न की मीमांसा नहीं हो सकती। जब हम देखते हैं कि अयोग्य पिताओं से योग्य पुत्र और योग्य पिताओं से अयोग्य पुत्र उत्पन्न हुए हैं, तब हम पैतृक अंश को कैसे इसका कारण मान सकते हैं ? यह कभी एक जन्म का काम नहीं है। किन्तु इस शक्ति के विकास में हज़ारों जन्म लगे होंगे; लाखों वर्ष तक क्रमशः यह उन्नति होती रही, अन्त में जा कर बुद्ध के आकार में संसार को उसका परिचय मिला और इतनी शताब्दियों के बीत जाने पर भी अब तक उसका प्रभाव वैसा ही वर्तमान है।

और, यह सिद्धि त्याग से प्राप्त होती है, परन्तु जब तक कुछ पास न होगा, त्याग कोई क्या और किसका करेगा ? अतएव जो मनुष्य कमाई नहीं करता उसको कुछ नहीं मिलता। यह सृष्टि का नियम है और यह नियम सर्वत्र काम कर रहा है। कोई मनुष्य धनवान् होने के लिए आयु भर लाखों छल-छिद्र करता रहे, हज़ारों को धोखा दे; पर अन्त में उसे मालूम हो जाता है कि धन पर उसका कोई अधिकार नहीं था और इसलिए उसका जीवन दुःख और अशान्ति का जीवन बना रहा। हम भौतिक ऐश्वर्य और शारीरिक सुख के चाहे जितने सामान इकट्ठे करते चले जावें, पर हमारा अपना अधिकार केवल उस पर होता है जिसको हमने अपने परिश्रम से उपार्जन किया हो। मूर्ख लोग हज़ारों पुस्तकों से अपने पुस्तकालय को भर देते हैं, परन्तु वे पढ़ उन्हींको सकते हैं जिनको पढ़ने का उन्होंने अधिकार प्राप्त किया है और यह अधिकार हमको अपने कर्मों से मिलता है। हमारे कर्म ही हमारे भाग्य