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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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६ कर्मयोग

देखो। मूर्ख से मूर्ख और निर्बुद्धि से निर्बुद्धि मनुष्य भी किसी न किसी समय महान् और बुद्धिमान् बन जाता है। हमें मनुष्य के साधारण कामों को देखना चाहिए। प्रात्यहिक छोटे छोटे और तुच्छ कामों को देख कर उसके आचरण का पता लग जायगा। क्योंकि यही काम उसकी मानसिक वृत्तियों को बनाते रहते हैं। कभी कभी ऐसा भी देखने में आता है कि छोटे छोटे आदमी समय पाकर बड़े बन जाते हैं। यथार्थ में बड़ा आदमी वह है जो प्रत्येक दशा में बड़ा है और जहाँ कहीं भी जिस दशा में नियुक्त किया जावे, वहाँ उस दशा में बड़ाई के काम करता रहे।

मनुष्य के आचरण पर कर्म का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव ऐसा बलिष्ठ होता है कि इसका रोकना बड़ा कठिन है। यों समझ लो कि इस संसार के वृत्त में मनुष्य एक केन्द्र है, जो संसार की सारी शक्तियों को अपनी ओर खींच रहा है। खींच कर और सबको मिला कर फिर उनको भारी लहर या धार के स्वरूप में फेंक देता है। मनुष्य में बल है और ज्ञान है, जिससे वह संसार को अपनी ओर खींचे हुए है। पुण्य-पाप, सुख-दुख सब इसी की ओर खिंचे हुए हैं और इसी से चिपटे हुए हैं। इन्हीं साधनों से यह अपनी मानसिक वृत्तियों की तरङ्ग-पूर्ण धारा को बनाता है, जिसको चरित्र ( कैरेक्टर ) कहते हैं; और फिर इसको बाहर की ओर फेंक देता है। जहाँ इसमें भीतर की ओर खींचने की शक्ति है वहाँ बाहर की ओर फेंकने में भी यह कुशल है।

संसार के समस्त व्यवहार, मनुष्य-समाज के सम्पूर्ण प्रस्ताव और हमारे आस पास जो कुछ हो रहा है यह सब, मनुष्य के