कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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Read in contextसातवाँ अध्याय
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घूम रहा है, तब तक वह न तो निष्काम कर्म ही कर सकता है और न कर्म-योग का अधिकारी ही बन सकता है। इसलिए कर्म-योग में सबसे पहले अपने आपे को मिटाना होता है।
कर्म-योगी चाहे और किसी सिद्धान्त को न माने, उसका चाहे ईश्वर पर भी विश्वास न हो, वह सांख्य और वेदान्त के गूढ़ रहस्यों को भी चाहे न जानता हो, पर उसके लिए यह अत्यन्त आवश्यक और उचित है कि वह स्वार्थ-त्याग का अभ्यास करता हुआ अपनी अहंता (खुदी) को बिलकुल मिटा दे। उसका जीवन दूसरों के लिए होना चाहिए, न कि अपने लिए। जो दूसरों के लिए आप मिट सकता है, चाहे वह किसी सिद्धान्त या मत का अनुयायी हो, सच्चा कर्मयोगी है। भक्त-जन भक्ति से और ज्ञानी ज्ञान से भी इसी पदवी को प्राप्त करते हैं।
अब प्रश्न यह है कि कर्म क्या है? क्या हम संसार का उपकार कर सकते हैं? यथार्थ में तो इसका उत्तर "नहीं" है परन्तु सापेक्ष दशा में इसका उत्तर 'हाँ' होगा। कोई मनुष्य पूर्ण रीति पर संसार को लाभ नहीं पहुँचा सकता, यह असम्भव है। यदि ऐसा हो तो फिर संसार संसार ही न रहेगा। आप थोड़ी देर के लिए किसी भूखे की भूख मिटा सकते हैं, पर उसे भूख फिर सतावेगी। प्रत्येक प्रकार का सुख अनित्य है। कोई किसी को सदा के लिए न सुख पहुँचा सकता है, न दुःख। समुद्र में एक स्थान पर लहरें उठती हैं, दूसरी जगह खाली हो जाती है। संसार के समस्त उपकारों का परिणाम प्रत्येक समय में मनुष्य की इच्छा और चेष्टा के अनुसार एक सा रहा है। न कोई उसको बढ़ा सकता है, न घटा