कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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कर्मयोग
आंशिक और तदन्तर्गत बातों को देश, काल और अवसर के अधीन कर देते हैं। एक देश में एक काम अच्छा समझा जाता है, दूसरे देश में वही बुरा हो जाता है, क्योंकि उन दोनों की दशा एक सी नहीं होती।
निदान सृष्टि का सबसे बड़ा उद्देश मुक्ति है और मुक्ति केवल निष्काम कर्म करने से प्राप्त होती है। प्रत्येक शब्द, सङ्कल्प और कर्म—जिनमें स्वार्थ का लेश नहीं है—हमको मुक्ति की ओर ले जाते हैं, इस-लिए सदाचार का भी सबसे बड़ा आदर्श स्वार्थ-त्याग ही है। प्रत्येक धर्म और प्रत्येक जाति का धार्मिक दर्शन और ऐतिहासिक साहित्य इस आदर्श की सत्यता को स्वीकार करता है। कोई कोई धर्म यह शिक्षा देते हैं कि मनुष्य-जीवन का यह आदर्श ईश्वर की ओर से है। यदि तुम उनसे प्रश्न करो कि हम यह कर्म क्यों करें ? तो उत्तर मिलेगा कि "यह ईश्वर की आज्ञा है।" चाहे इसका कारण कुछ ही हो, सब में एक भाव काम करता मिलेगा और वह यह है कि अपने अभिमान और अहंभाव को दूर कर दो। परन्तु फिर भी बहुत से मनुष्य ऐसे होंगे जो यह बात सुनकर चौंक पड़ेंगे। क्योंकि ममता ने उनको जकड़ रक्खा है, वे यह समझते हैं कि आपे को मिटाने से हम आप ही न रहेंगे। वे भूले हुए हैं, वे चाहे ममता करें या न करें; मौत प्रत्येक दशा में अपना काम करेगी। अन्तर केवल इतना ही है कि ममता और अहंभाव में पड़े रहने से मौत उनके लिए बड़ी भयानक और दुःख-दायक होगी और इनको मिटा देने से वही मौत सुहावनी और सुखदायिनी हो जायगी। जब तक मनुष्य अहंभाव के मद से उन्मत्त है और अहंकार के चक्र में