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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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पञ्चम अध्याय-२ ] [ ३४३
वचन सुन कर क्या कहा ? यह सभी भविष्य-वार्ता हमे सुनाइये ।२१-
२२। यह सुन कर सूतजी शोक-मोह का नाश करने वाली एव तत्व-
ज्ञानमयी उस वार्ता का वर्णन पुनः करने लगे ।२३। सूतजी ने कहा—
फिर उन राजागण के जिज्ञासा करने पर अनन्त ने तपस्या के द्वारा
माया का निवारण और इन्द्रियो के निग्रह का प्रसग कहा ।२४। II
बोला—मैं वन मे पुन जाकर विधिवत् तप करने लगा, तो भी अपनी
इन्द्रियो और मन का निग्रह नही कर पाया ।२५।
वने ब्रह्म ध्यायतो मे भार्यापुत्रधनादिकम् ।
विषयान्तरा शश्वत्स्मारयति मे मनः ।२६।
तेषा स्मरणमात्रेण दुःखशोकभयादयः ।
प्रतुदन्ति मम प्राणान्धारणा-ध्याननाशका ।२७।
ततोऽह निश्चितमतिरिन्द्रियाणांच घातने ।
मनसो निग्रहस्तेन भविष्यति न सशय ।।२८।।
अतो मामिन्द्रियाणाञ्च निग्रहव्यग्रचेतसम् ।
तदधिष्ठातृदेवाश्च दृष्ट्वा मामीयुरञ्जसा।२६।
रूपिणो मामथोचुस्ते भोऽनन्त ! इति ते दश ।
दिग्व तार्कप्रचेतोऽश्वि-वह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ।।३०।।
मैं जब-जब ब्रह्म का ध्यान करने में तत्पर होता, तब-तब ही
मुझे स्त्री, पुत्र, धनादि की बातें स्मरण हो आती और मेरा ध्यान भग हो
जाता २६। इस प्रकार स्त्री, पुत्र तथा धनादि का स्मरण होते ही मेरा
अन्तरात्मा दुख, शोक और भय आदि से व्याकुल हो जाता । इस प्रकार
ध्यान में बाधा उपस्थित हो गई ।२७। मैंने पुनः यह विचार करके कि
इन्द्रिय-निग्रह से मन भी वश मे हो जायगा, इन्द्रियो के निग्रह का ही
संकल्प किया ।२८। ऐसा संकल्प करके जब मैं इन्द्रियों के दमन मे तत्पर
हुआ, तब इन्द्रियो के अधिष्ठातृ देवता मेरी ओर ताकने लगे ।२६। तब
दशो इन्द्रियो के अधिष्ठातृ देवताओ ने साक्षात् प्रकट होकर मुझसे कहा--