Skip to content
SarvaKosh
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

Page 89 of 259

Read in context
Page 89

३४२ ] [ कल्कि पुराण
गावो यथा नसि प्रोता गुणाबद्धा. खगा इव ।१६।
तां मायां गुणमय्या ये तितीर्षन्ति मुनीवरा ।
स्त्रवन्ती वासनानक्रां त एवार्थविदो भुवि ॥२०॥
अहङ्कार से प्रथम त्रिगुणात्मक पञ्चतन्मात्र प्रकट हुआ। पञ्चतन्मात्र
से पञ्चमहाभूत हुए। इस प्रकार प्रकृति में पुरुष के अधिष्ठान करने से ही
सृष्टि का उदय होता है ।१६। फिर देवता, दानव, मनुष्य तथा अन्यान्य
जीव अर्थात् जितने भी जन्म लेने वाले और मरणधर्मी प्राणी हैं, वे सब
उत्पन्न होते हैं ।१७। ईश्वर की माया के वश में पड़े रहने से सभी जीव
सांसारिक कार्यों में लिप्त रहे आते हैं तथा अपने उद्धार का प्रयत्न नहीं
कर पाते ।१८। अहो, यह माया कैसी बलवती है, जिसके वश में ब्रह्मादि
देवता भी नाथे हुए बैल और डोरी से बाँधे हुए पक्षी के समान नाचते
करते हैं ।१६। जो मुनिवर इस प्रकार के वासना रूपी नक्र की उत्पत्ति-
त्री गुणमयी माया से मुक्त होने का उपाय करते हैं, उन्ही ज्ञानियों का
जन्म सार्थक समझो ।२०।
मार्कण्डेयो वसिष्ठश्च वामदेवादयोऽपरे ।
श्रुत्वा गुरुवचो भूय. किमाहु श्रवणादृताः ।२१।
राजानोऽनन्तवचनमिति श्रुत्वा सुधोपमम् ।
किं वा प्राहुरहो सूत ! भविष्यमिह वर्णय ।२२।
इति तद्वच आश्रुत्य सूतः सत्कृत्य तं पुनः ।
कथयामास कात्स्न्र्येन शोकमोहविघातकम् ।२३।
तत्रानन्तो भूपगणै. पृष्ट प्राह कृतादर ।
तपसा मोहनिधनमिन्द्रियाणाञ्च निग्रहम् ।२४।
अतोऽहवनमासाद्य तप्तं कृत्वा विब्रानत. ।
नेन्द्रियाणा न मनसो निग्रहोऽभूत्कदाचन ।२५।
शौनक बोले — हे ब्रह्मन् ! मार्कण्डेय, वसिष्ठ, वामदेव तथा
अन्यान्य मुनियो ने परमहंस के वचन सुन-कर क्या कहा था ? तथा अनन्त
के इस उपाख्यान को सुनने वाले राजाओ ने अनन्त के सुधा के समान