कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 85 of 259
Read in context३३८ ] [ कल्कि पुराण
मैं स्नेह और मोह के वशीभूत होकर आत्मविस्मृति को प्राप्त
हुआ हूँ, परन्तु इस बात को कौन जानता है ? ।५२। इस प्रकार मैं
भार्या, धन के भंडार और पुत्र के विवाहादि मे अत्यन्त अनुरक्त शोक
और दुख मे युक्त हो गया। मै सोचने लगा कि मैं अनन्त कौन हूँ ?
परतु कुछ भी नही समझ पाया । सभी विषय स्वप्न के समान लगने लगे
।५३। तभी मेरी मानिनी पत्नी मुझे उस विवश और मूढ के समान
अवस्था मे देख कर मेरे पास आकर रोती हुई चिल्लाने लगी कि हा, यह
क्या हुआ ! ।५४। वहाँ अपनी पूर्व भार्या को इस प्रकार देख कर और
फिर उन स्त्री-पुरुषो का स्मरण करके अत्यन्त कातर हृदय तथा सन्तप्त
हो उठा । तभी एक वीर, सर्वज्ञानी, पूर्ण धर्मज्ञ, सूर्य के समान तेजस्वी,
सतोगुणी , शान्त, शुद्ध तथा ससार-शोक का नाश करने मे समर्थ
परमहस मुझे ज्ञान देने के निमित्त वहाँ पधारे। तभी मेरे बाधवो ने
उनका पूजन किया और मेरे कल्याण का उपाय पूछने लगे ।५५-५७।