Skip to content
SarvaKosh
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

Page 84 of 259

Read in context
Page 84

चतुर्थ अध्याय-२ ] [ ३३७
तया हरेर्माययाह मूढो व्याकुलितेन्द्रियः ।५१।
जब मैं स्नान — तर्पणादि से निवृत्त होकर जल से निकल कर तट
की ओर चला, तभी देखता हूँ कि मेरे पहिले के सभी बंधु बांधव सन्ध्यादि
कर्म कर रहे हैं। यह देख कर मेरा मन उद्विग्न हो उठा ।४६।
हे राजाओ ! पुरुषोत्तम धाम मे रहने वाले उन ब्राह्मणो को भगवान्
विष्णु की सेवा एव द्वादशी के पारण मे तत्पर देख कर मैं चकित हुआ
।४७। मेरे रूप और वय मे पहिले से कुछ भी परिवर्तन न हुआ देख कर
और मुझे विस्मयपूर्वक अपने को देखता देख कर उन्होने कहा ।४८। हे
अनन्त ! तुम विष्णु भक्त हो । क्या तुमने जल अथवा स्थल मे कही कुछ
ऐसा दृश्य देखा है, जिससे इतने व्यग्रचित्त दिखाई दे रहे हो ! ।४६।
यदि कुछ देखा हो तो बताओ और विस्मय को छोड कर पारण करो।
यह सुन कर मैंने कहा— मैंने कही कुछ भी नही देखा-सुना । परन्तु मैं
काम से मोहित होकर दुर्बल हृदय हो गया हूँ। मैं भगवान् श्रीहरि
की माया से ही विमूढ और व्याकुल इन्द्रिय वाला हो रहा हूँ ।५०-५१।
न शर्मं वेद्मि कुत्रापि स्नेहमोहवशं गतः ।
आत्मनो विस्मृतिरिय को वेद विदिता तु ताम् ।५२।
इति भार्या धनागार-पुत्रोद्वाहानुरक्तधी. ।
अनन्तोऽह दीनमना न जाने स्वापसम्मितम् ।।५३।।
मां वीक्ष्य मानिनो भार्या विवशं मूढवस्थितम् ।
क्रन्दन्ती किमहोऽकस्मादालपन्ती ममान्तिके । ५४।
इह ता वीक्ष्य तास्तत्र स्मृत्वा कातरमानसम् ।
हंसोऽप्येको बोधयितुमागतो मां सदुक्तिभिः ।५५।
घोरो विदितसर्वार्थः पूर्णः परमधर्म्मवित् ।५६।
सूर्य्यकार तत्त्वसार प्रशान्त दान्त शुद्ध लोकशोकक्षयि-
ष्णा म् । ममाग्रे त पूजयित्वा मदङ्गाः पप्रच्छुस्ते मच्छुभष्या-
नकामाः ।५७।