कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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चतुर्थ अध्याय-२ ] [ ३३५
नामक एक ब्राह्मण सध्योपासन से निवृत्त हो कर मुझे अपने घर ले
गये । स्त्री पुत्रादि से युक्त, धनवान् एव धर्मात्मा वृद्ध शर्मा मुझे स्वस्थ
करके पुत्र के समान पालने लगे ॥३५-३६॥
अहन्तु तत्र दीनात्मा दिग्देशाभिज्ञ एव न ।
दम्पती तौ स्वपितरौ मत्वा तत्रावस नृपाः ।३७।
स मा विज्ञाय बहुधा वेदधर्मेष्वनुष्ठितम् ।
प्रददौस्वा दुहितर विवाहे विनयान्वित ।३८।
लब्ध्वा चामीकराकारा रूपशीलगुणान्विता ।
नाम्ना चारुमती तत्र मानिनी विस्मितोऽभवम् ।३६।
तयाह परितुष्टात्मा नानाभोगसुखान्वित. ।
जनयित्व पञ्चपुत्रान्समदेनावृतोऽभवम् ॥४०॥
हे राजाओ ! उस स्थान पर रहते हुए मुझे दिशा और देश का
भी ज्ञान न रहा, इसलिए दुःखित हृदय से उन ब्राह्मण दम्पत्ति को ही
अपना माता-पिता मानता हुआ, वही रहने लगा ।३७। उन ब्राह्मण ने
मुझे सब प्रकार से वेद-धर्म का अनुष्ठाता जान कर विनय पूर्वक अपनी
कन्या का दान कर दिया ।३८। उस तप्त स्वर्गा जैसे वर्ण वाली, रूप, शील
और गुण से युक्त कन्या का नाम चारुमती था। उस मानिनी को भार्या
रूप मे प्राप्त का मैं विस्मय मे पड गया ।३६। च रुमती ने मुझे सेवा
द्वारा सदा सतुष्ट रखा और मैं उसके साथ विभिन्न प्रकार के सुखो का
उपभोग करने लगा । उससे मेरे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए और निरन्तर मेरे
सुख की वृद्धि होने लगो ।४०।
जयश्च विजयश्चैव कमलो विमलस्तथा ।
बुध इत्यादय. पच विदितास्तनया मम ।४१।
न्स्वजनेर्बन्धुभिः पुत्रैर्धनैर्नानाविधैरहम् ।
विदितः पूजितो लोके देवैरिन्द्रो यथा दिवि ।४२।
बुधस्य ज्येष्ठपुत्रस्य विवाहार्थ समुद्यतम्।